मनसंपर्क का कंप्यूटर उबुंटु

सोपान जोशी

[ इस लेख का संपादित रूप नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान की पत्रिका
गांधी मार्गके नवंबरदिसंबर 2011 के अंक में छपा है ]

धूप से तपते हमारे जीवन के रास्ते में गांधीजी एक घने पेड़ हैं। उनकी छाया में कोई भी शरण ले सकता है। तरह तरह के लोग गांधीजी को अपनी प्रेरणा बताते हैं फिर चाहे उन्होने किसी भी तरह की हिंसा और धोखे से करोड़ो की संपत्ति जुटाई हो। ऐसे लोगों की कहानियां संचार की दुनिया में अटी मिलेगी क्योंकि ये लोग अपनी हिंसा, धोखाधड़ी पर लीपापोती करने के लिए पहले तो लोगों को भाड़े पर रखते थे। और अब तो इस काम को खूब व्यवस्थित ढंग से करने वाली बड़ीबड़ी जनसंपर्क कंपनियां ही बन गयी हैं। मरने के बाद संस्थाओं के नाम उन पर रखे जाते हैं। उनके नामों के साथ कई विषेशण लगते हैं जिनमें जनऔर लोकके उपसर्ग होते हैं। विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा माना गया पुरस्कार विध्वंसक हथियार बनाने और बेचने वाले अलफ्रेड नोबेल के नाम से दिया जाता है, जिन्होने डाइनामाइट इजाद किया और बोफोर्स नाम की कंपनी को इस्पात की बजाए तोप बनाने में लगा दिया। अगर गांधीजी को ये पुरस्कार मिलता तो?

फिर ऐसे भी लोग मिलेंगे जो कहीं से भी गांधीवादी नहीं कहे जा सकते लेकिन जिनके जीवन और काम, मूल्य और भावना में वही गंध होगी जो गांधीजी के जीवन और काम में थी। ऐसे लोग आसानी से दिखाई नहीं पड़ते क्योंकि हमारी संवेदनाएं संचार माध्यम और उनके विषेशणों से कुंद हो चली हैं। और जो सही में अच्छा काम करते हैं वो जनसंपर्क की बजाए मनसंपर्क में विश्वास रखते हैं। मनसंपर्क के लिए कोई सरकारी विभाग नहीं होता और न ही इसे किसी कॉलेज में सिखाया जाता है। अगर आप किसी का मन प्रेम से छू लें तो उसका कोई सर्टिफिकेट नहीं मिलता। मनसंपर्क अपने आप ही अपना पुरस्कार है।

जनसंपर्क और मनसंपर्क का ये अंतर साफ दिखेगा कंप्यूटर की दुनिया में। ये दुनिया नई है, हमारे यहाँ तो बहुत ही नई। इतनी की अभी हमारी भाषा को समय नहीं मिल पाया है इससे जान पहचान बनाने का कि वह इस नई दुनिया के लिए कुछ सरल, संस्कारी संज्ञाएं और क्रियाएं गढ़ सके। इस दुनिया की बातचीत अभी तो बहुत असहज शब्दों में ही होती है। इसके बावजूद हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा इस दुनिया में ही विचरता है। कई लोगों का काम आजकल कंप्यूटर के बिना नहीं चलता। बहुत से ऐसे भी हैं जो खुद चाहे कंप्यूटर का इस्तेमाल न करते हों पर उनका काम किसी और के कंप्यूटर पर निर्भर रहता है। कई लोगों को कंप्यूटर महज जंजाल लगता है और जबरन सीखना पड़ता है। फिर ऐसे भी हैं जिनका सूरज उगता नहीं है जब तक फेसबुक पर अपनी टुच्ची भावनाओं का प्रसार न कर लें और पूरे जगत को फोटो के साथ बता न दें कि उन्होने कलेवे में क्या खाया!

हमारे समाज के इस हिस्से को जानने के लिए हमें कुछ अटपटे शब्दों को जानना पड़ेगा। मशीन और उसके पुर्जे और उसकी इंजीनियरी को छोड़ दें तो भी। जैसे सॉफ़्टरवेयर प्रोग्राम। ये गणित की अंक मालाएं हैं जिन्हे कुछ ऐसे पिरोया जाता है कि मशीन चलाने वाले की आज्ञा जैसा काम कर सकें। जैसे बढ़ई मेज में दराज ऐसे बनाता है कि खींचने पर वो बाहर आ जाए और धकाने पर भीतर चली जाए। दराज खोलिए। जो रखना है रखिए और काम होने पर उसे बंद कर दीजिए। जो काम मेज पर कागज रख कर होता है या तख्ती को गोद में रख कर होता है, वैसे ही कंप्यूटर के डिसप्ले पर हो जाता है। इसलिए उसे भी डेस्कटॉप या लैपटॉप ही कहते हैं।

एक और शब्द है औपरेटिंग सिस्टम या ‘ओएस’। अगर कंप्यूटर की मशीन को हम रेल गाड़ी मान लें तो ओएस वो पटरी होती है जो हमें दिखती नहीं है क्योंकि हम उसके ऊपर चल रहे हैं। कंप्यूटर की गाड़ी वहीं जा सकती है जहाँ तक ओएस उसे ले जाए। जिस ओएस पर आप चलेंगे उस पर उसी तरह के पड़ाव आएंगे जो ओएस बनाते समय तय हुए हैं। लखनऊ से पटना के रास्ते में चाहकर भी हैदराबाद नहीं आता।

इस नए और असहज संसार के भीतर अगर ठीक से झांक कर देखें तो उठाईगिरी का साम्राज्य दिखाई देगा। हमारे यहाँ ज्यादातर कंप्यूटरों के भीतर चोरी के सॉफ़्टवेयर चलते हैं। कुछ तो दुकानदार ही डाल देते हैं और कुछ इंटरनेट से डाउनलोड कर के इस्तेमाल होते हैं। कम ही लोग सारे सॉफ़्टवेयर पैसा दे कर खरीदते हैं। सबसे ज्यादा कंप्यूटर माइक्रोसॉफ़्ट कंपनी के ‘विंडोज़’ ओएस पर चलते हैं जो किसी भी मशीन में डाला जा सकता है। खासकर उन मशीनों में जो सस्ते पुर्जे थोक में खरीद कर जुगाड़ करके बनाई जाती हैं। जो ज्यादा खर्च करने को राजी हो वो ऐपल कंपनी के बहुत ही लुभावने दिखने वाले कंप्यूटर लेते हैं जिनका ओएस भी ऐपल ही बनाता है।

इस तरह कंप्यूटर की दुनिया के ये दो सबसे प्रसिद्ध नाम हैं: माइक्रोसॉफ़्ट और ऐपल। जाहिर है इनके मालिक भी प्रसिद्ध ही होंगे।

माइक्रोसॉफ़्ट के बिल गेट्स कई साल दुनिया के सबसे अमीर आदमी माने जाते थे और आजकल गरीब देशों की भलाई में करोड़ो डॉलर दान में दिए हुए हैं, जैसे भारत में। ऐपल के स्टीव जॉब्स का हाल ही में निधन हुआ। पूरी दुनिया उनके कदम चूम रही थी, उन्हे युग पुरुष का दर्जा देती दिखी थी। उन्हे व्यापार की दुनिया का सबसे शक्तिशाली आदमी कहा गया और हमारे युग का महानतम अविष्कारक भी। शेयर मार्किट में ऐपल की कीमत भारत के कुल आर्थिक उत्पाद की 30 प्रतिशत आंकी जाती है। ऐस बताया जाता है कि ऐपल के बैंक खातों में अमरीका की सरकार से ज्यादा धन जमा है। अगर ऐपल अपने आप में एक देश होता तो उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया में 59 पर होती।

कंप्यूटर को घरघर पहुँचाने में जॉब्स और गेट्स का योगदान विशेष माना जाता है। पर इनकी अपार धनदौलत के पीछे भी चोरी और छीनाझपटी की कहानी है। जिन कंप्यूटरों मे असली ओएस और सॉफ़्टवेयर बाकायदा रुपया खर्च कर के डाले होते हैं वो भी चोरी की दुनिया से ही निकले हैं। समझने के लिए हमें 35 साल पीछे जाना पड़ेगा।

तब के शुरुआती कंप्यूटर आकार में बहुत बड़े और आम लोगों के लिए तो बेकार ही थे। केवल विज्ञान और गणित में शोध करने वाले ही इनका इस्तेमाल करना जानते थे और कंप्यूटर उन्ही की जरूरत भी पूरी करता था। उतनी पढ़ाई के बिना कोई कंप्यूटर चला भी नहीं सकता था क्योंकि उसे चलाने के लिए जटिल कंप्यूटरी भाषाएं, सॉफ़्टवेयर कोड जानने की जरूरत होती थी। इसलिए फिर होड़ हुई ऐसे कंप्यूटर बनाने की जो जनजन के काम आए। जिसे खरीदने के लिए आम लोग भी कुछ खर्च को तैयार हो जाएं। जवाब केवल एक कंपनी के पास था और उसका नाम था ज़ेरॉक्स। जी हाँ, जिसे हम आज बस केवल फ़ोटोकॉपी की मशीन भर के लिए जानते हैं।

ज़ेरॉक्स के वैज्ञानिकों नें एक ऐसा कंप्यूटर बना लिया था जिसे चलाने के लिए अब सॉफ़्टवेयर की जटिल भाषा आना जरूरी नहीं था। किताब से रटे हुए कोड नहीं उगलने पड़ते थे। सामने की स्क्रीन पर दुर्गम कंप्यूटर भाषा के कोड नहीं आते थे। एक जीवंत कॅनवास आता था और उस पर सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम के चित्र बने हुए थे। एक चूहे सी दिखने वाली छोटासी डिब्बी एक तार के जरिए कंप्यूटर से जुड़ी थी। उसकी पीठ पर दो बटन थे। इसे हिलाने से स्क्रीन पर एक बिंदु चलता था। जिस चित्र पर उस बिंदु को ला कर बटन दबाया नहीं कि वह काम, प्रोग्राम शुरु हो जाता था।

जिन वैज्ञानिकों ने यह सब बनाया था उन्हे 1978 में झटका लगा जब उनकी कंपनी ने ऐपल में कुछ शेयर खरीदने के बदले ऐपल के इंजीनियरों को उनकी बनाई मशीनें देखने का अधिकार दे दिया। ज़ेरॉक्स का शोध, उनकी मशीनें देखने के बाद ऐपल की दिशा बदल गयी और उसने ज़ेरॉक्स की देखादेखी चित्रों में काम शुरु किया। फिर ऐपल नें ज़ेरॉक्स के वैज्ञानिकों को ज्यादा वेतन दिखा कर खींच लिया। 1984 में ऐपल का मॅकिंतोश कंप्यूटर बाजार में आया जो ज़ेरॉक्स के अविष्कारों की तर्ज पर बना था। स्टीव जॉब्स नें कई बार कहा है कि उन्हे दूसरों का बढ़िया विचार और अविष्कार चुराने में कभी शर्म नहीं आयी। ये भी कि अच्छे कलाकार नकल करते हैं, जबकि महान कलाकार चुराते हैं।

इसका परिणाम उन्हे 1984 में ही भुगतना पड़ा। उन्होने ज़ेरॉक्स की तर्ज पर बनाई अपनी मशीनें  माइक्रोसॉफ़्ट के बिल गेट्स को भरोसे और एक अनुबंघ के तहत दी थीं। उनके कंप्यूटर के बाजार में आने के पहले माइक्रोसॉफ़्ट ने अपना विंडोज़ ओएस जारी कर दिया। ये ऐपल की नकल से बना था। चोर के घर में सेंध लग गयी थी। यहाँ से बिल गेट्स और माइक्रोसॉफ़्ट का साम्राज्य बढ़ता ही चला गया। सन् 1988 में ऐपल नें उनपर पेटेंट की चोरी का आरोप लगाया और मुकदमा किया। जब मामला अमरीका के उच्चतम न्यायालय में चला गया तो ज़ेरॉक्स नें ऐपल पर चोरी का मुकदमा कर दिया। दोनो मुकदमों में चोरी करने वाले की जीत हुई।

बिल गेट्स ने 1976 में कंप्यूटर पर काम करने वालों के लिए एक खुला पत्र लिखा था जिसमे सॉफ़्टवेयर की चोरी को अनैतिक और खतरनाक ठहराया था क्योंकि इससे अविष्कार करने वाले के अधिकार की हानि होती है। नैतिकता का पाठ पढ़ाने की माइक्रोसॉफ़्ट की कहानी और भी विचित्र है। 1980 में कंपनी ने 50,000 डॉलर खर्च कर एक ओएस खरीदा और उस पर अपना नाम लिख कर अगले दिन आईबीएम कंपनी को बेच दिया। तब आईबीएम कंप्यूटर बेचने वाली सबसे बड़ी कंपनी थी। इस बिक्री से माइक्रोसॉफ़्ट ज्यादातर कंप्यूटरों का ओएस बन गया। पर आज तक ये सभी कंपनिया एक दूसरे पर पेटंट चुराने के आरोप और मुकदमे करती रहती हैं। 1998 में खुद अमरीका की सरकार ने माइक्रोसॉफ़्ट पर अभियोग चलाया बेइमानी और घोखाधड़ी से अपने विभिन्न प्रतियोगियों को दबाने का। आरोप था एकाधिकार का दुरुपयोग। माइक्रोसॉफ़्ट को पता था कि कंप्यूटर बनाने वाली कंपनिया उसकी मोहताज थीं इसलिए वो उनको कोई भी और ओएस डाल कर कंप्पयूटर बेचने से रोकता था। फिर ओएस के एकाधिकार की वजह से दूसरे सॉफ़्टवेयर बनाने वालों के सामान भी इन मशीनों में नहीं लगाए जाते थे।

फैसला सुनाते हुए न्यायधीश ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट के अधिकारियों ने बार बार गलत और भ्रमित करने वाली जानकारी न्यायालय को दी और एकदम साफ़ तौर पर झूठे साबित हुए। उन्होने कहा कि ये कंपनी के ढाँचे में ही सत्य और न्यायप्रियता के प्रति नफरत भरी पड़ी है। कंपनी के शीर्ष अधिकारियों को धोखेबाजी से कोई परहेज नहीं है। अपने झूठे बयानों को छुपाने के लिए और अपने अपराधों पर पर्दा डालने के लिए यह कुछ भी कर सकती है। लेकिन फिर भी मामला अपील में जा कर कमजोर पड़ गया और कंपनी बहुत सस्ते में छूट गयी। असत्य पर खड़ी कंपनी को टिकाए रखने के लिए वकीलों की एक पूरी फौज हमेशा तैयार रखी जानी है। इस कंपनी के वकीलों की हमेशा चांदी ही चांदी है। अभी हाल ही में पता चला था कि माइक्रोसॉफ़्ट के कानूनी विभाग का तीन साल का खर्च 430 करोड़ डॉलर था जो तकरीबन 21,500 करोड़ रुपए हुआ। इसमे 30 करोड़ डॉलर वकीलों की फ़ीस थी और 400 करोड़ डॉलर मुआवज़े में दी हुई रकम थी।

कुछ साल पहले बिल गेट्स ने माइक्रोसॉफ़्ट का शासन छोड़ दिया और आजकल गरीब देशों की भलाई के काम में जुटे हुए हैं। उनके नाम से बिल एण्ड मेलिंडा गेट्स फाऊंडेशन भी है जो गैरसरकारी संस्थाओं को करोड़ो रुपए अनुदान में देती है। अपने अनेक भाषणों में वे गांधी जी की प्रेरणा का जिक्र कर चुके हैं। स्टीव जॉब्स तो बौद्ध धर्म का पालन करते थे और अपने आप को तरुणाई से अध्यात्मिक बताते थे।एपल के एक प्रसिद्ध विज्ञापन में गांधीजी भी दिकाए जाते थे। अनूठे और कालजयी विचारों वाले लोगों के फोटो के साथ ऐपल का संदेश आता था — ‘थिंक डिफरेंट

दोनों ने धोखाधड़ी और चोरी से अरबों रुपए बनाए। दोनों की कंपनियों ने हिंसा का उपयोग किया। कानूनी कार्यवाही या उसकी धमकी भी एक तरह की हिंसा ही है। कई छोटे मोटे व्यक्तियों और कंपनियों के खिलाफ़ माइक्रोसॉफ़्ट और ऐपल नें मुकदमे चलाए और उनको सताया। माइक्रोसॉफ़्ट के दफ़्तर में एल ‘ब्लैक लिस्ट’ हुआ करती थी ऐसे पत्रकारों की जो उसकी कारगुजारियों पर सटीक लिखते थे। उन्हे जानकारी नहीं दी जाती थी और उन्हे परेशान भी किया जाता था।

छोड़िए इन बातों को। इनके बनाए हुए औजार तो देखिए। अगर आप माइक्रोसॉफ़्ट के ओएस इस्तेमाल करते हैं तो आपको हमेशा कंप्यूटर वायरस का खतरा रहेगा, जो कुछ पलों में अपका वर्षों का काम तमाम कर सकते हैं। इससे बचने के लिए आपको मंहगे ऐंटीवायरस सॉफ़्टवेयर खरीदने पड़ेंगे। इनको चलाने से आपका कंप्यूटर धीमा चलने लगेगा। कंप्यूटर की दुनिया के लोग आपको बताएंगे कि माइक्रोसॉफ़्ट के विंडोज़ ओएस में कई खामियां हैं और आए दिन नयी खमियां पता चलती रहती हैं। क्योंकि व्यापार की दुनिया उनसे चमत्कृत रहती है इसलिए उन्ही का बोलबाला चलता है।

ऐपल के कंप्यूटर इसकी तुलना में कहीं बेहतर होते हैं पर बहुत मंहगे। उनमे बस केवल ऐपल के ही पुर्जे लग सकते हैं और हर पुर्जे का दाम बाजार के दाम से दुगुनातिगुना होता है। अगर आप हिंदी जैसी किसी युरोप से बाहर की भाषा में काम करना चाहते हैं तो आपको कई तरह की परेशानी आनी तय हैं। जैसे कि फ़ौंट का नहीं मिलना तो तय ही है। इससे स्क्रीन पर अक्षर टूटे फूटे दिखते हैं। ये सब इसलिए कि इन कंपनियों को हिंदी में मुनाफ़ा नहीं दिखता। ऐसी भावना नहीं है कि कोई और, जो हिंदी में काम करना चाहता हो उनको सॉफ़्टवेयर बना कर दे दे। ये कंपनिया अपने सॉफ़्टवेयर की कुंजी, कोड्स, किसी को बताती नहीं हैं क्योंकि उसपर इनका मालिकाना हक है। फिर चाहे वो चोरी का ही क्यों न हो। इनकी बात ज्यादा इसलिए होती है क्योंकि प्रेस और मीडिया में इनकी धन दौलत का दबदबा ज्यादा है और चूंकि इनकी पैरवी करने के लिए बड़ी बड़ी जनसंपर्क एजंसिया खड़ी रहती हैं।

पर कंप्यूटर की दुनिया ऐसे ही लोगों से बनी हो ऐसा नहीं है। उसमे कई ऐसे लोग हैं जिन्होने अपनी मेहनत और कल्पना से चीजें बनाई और उन्हे बिना मुनाफे कमाए समाज के सामने रख दिया। यही नहीं, उन्होने अपने बनाए सॉफ़्टवेयर की कुंजी भी सबके सामने रख दी जिससे जो भी चाहे उसकी नकल करके ले जाए और उसे बिना मुनाफे के और आगे बढ़ाए। इन लोगों को अमरीका के धनतंत्र में साम्यवादी कहा गया। इनका जवाब था एक बहुत सीधा सा सवाल: क्या पड़ोसी की मदद करना कार्ल मार्क्स का अविष्कार था?

इस सामाजिक दुनिया के शिखर पर एक ही नाम है। रिचर्ड स्टॉलमैन। अगर किसी को जानना हो कि गांधीजी कंप्यूटर की दुनिया को कैसे देखते तो स्टॉलमैन का जीवन देखना चाहिए। सन् 1971 में ऐसी मशीनें बनाने की कोशिश हो रही थी जो विचारपूर्ण काम कर सकें। इस शोध कार्यक्रम में स्टॉलमैन सॉफ्टवेयर बनाते थे। उन्हे ये गलत लगता था कि सरकारी अनुदान से बनने वाले सॉफ्टवेयर पर काम करने के लिए खुफिया कुंजीनुमा ‘पासवर्ड’ हों। तो चुपके से स्टॉलमैन पासवर्ड तोड़ देते, ताले खोल देते और बिना ताले की संस्कृति की बात करते हुए इन बातों की कुंजियां बांट देते।

जिस प्रयोगशाला में वो काम करते थे उसमें इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर को वो आम तौर पर खोल कर अपने और औरों के इस्तेमाल के लिए बेहतर बना लेते थे। जैसे उन्होने एक कंपनी के प्रिंटिंग सॉफ्टवेयर को खोलकर बदल दिया था ताकि दफ्तर के लोगों को पता चल जाए कि उन्होने जो दस्तावेज छपने भेजा है वो कब छप चुका है, जिससे अलग अलग मंजिलों पर काम करने वाले उनके सहयोगियों का समय बचता था। पर सन् 1980 में एक नया प्रिंटर लगने पर स्टॉलमैन को उसको चलाने वाले सोर्स कोड नहीं दिए गए। इससे उनके सहयोगीयों की परेशानी बड़ गयी। वो कहते हैं कि जब वो स्कूल जाते थे तब उन्हे सिखाया गया था कि अगर कुछ खाओ तो आसपास वालों के साथ बाँट कर खाना चाहिए। इसी वातावरण में वो बड़े हुए थे और हमेशा इसी भावना से उन्होने अपना काम किया था।

पर कंप्यूटर का बाजार बढ़ने के साथ ही सोर्स कोड छुपाने का काम शुरु हो गया था। उद्देश्य लोगों को सुविधा देना नहीं, ज्यादा सा कमाना हो गया था। पर ये स्टॉलमैन को मंजूर नहीं था। उन्हे लगता था कि कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाले के पास यह अधिकार होना ही चाहिए कि वो कंप्यूटर का सॉफ्टवेयर अपनी जरूरत के हिसाब से बदल ले और अपने प्रियजनों के साथ उसे बांट सके। फिर चाहे वो सॉफ्टवेयर उसे मुफ्त में मिला हो या पैसा दे कर खरीदा हो। अगर कंप्यूटर हमारी का अभिव्यक्ति का जरिया है तो उसमे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए। और सामाजिकता और अभिव्यक्ति की आजादी सॉफ्टवेयर बनाने वाले के व्यापारिक और मालिकाना अधिकार से बड़े मूल्य हैं, हमारी सभ्यता की नींव है, ऐसा स्टॉलमैन मानते थे।

तो जिस समय बिल गेट्स और स्टीव जॉब्स अपनेअपने तालाबंद के साम्राज्यों की नींव रख रहे थे तब स्टॉलमैन ने घोषणा की कि वो एक खुले सोर्स कोड का ओएस बनाएंगे, जिसे जो चाहे अपने हिसाब से बदल सके। उसका नाम रखा ‘ग्नू’। अगले साल उन्होने अमरीका की सबसे विख्यात तकनीकी प्रयोगशाला से अपनी नौकरी छोड़ दी ताकि उन्हे समय मिल सके अपना काम पूरा करने के लिए। एक साल के भीतर उन्होंने ग्नू घोषणापत्र लिख दिया।

स्टॉलमैन चाहते थे कि उनका काम लोग आजादी से मिलबाँट कर इस्तेमाल करें पर ये नहीं चाहते थे कि कोई भी उन बदलावों पर एकाधिकार बनाए। इसलिए उन्होने एक नई तरह का कॉपीराइट बनाया जिसे अब कॉपीलेफ्ट कहा जाता है। इसका नाम था ग्नू जनरल पब्लिक लाइसेंस। इसकी एक ही खास शर्त थी: इस लाइसेंस में जारी किए काम को आगे इसी लाइसेंस में आगे बढ़ाया जा सकता था। मतलब कोई भी स्टॉलमैन के काम का खुला उपयोग कर सकता था बशर्ते उनका काम भी खुले उपयोग के लिए हो। इसके साथ ही उन्होने फ्री सॉफ्टवेयर फाउंडेशन नामक संस्था बनाई। वो हमेशा कहते हैं कि फ्री से उनका माने मुफ्त नहीं है बल्कि मुक्त है। एकाधिकार से मुक्त। बाँटने के लिए मुक्त। कमाने के लिए भी मुक्त, पर दूसरो की आजादी की कीमत पर नहीं।

अगले छह साल में ग्नू का काम बहुत तेजी से हुआ। स्टॉलमैन जब भी कोई सॉफ्टवेयर बनाते उसके सोर्स कोड भी साथ दे देते। चुनिया भर में उनके मित्र उनका काम आजमाते और उसकी खामिया सुधार कर अपने काम भी लेते और वापिस भी लौटा देते। ये सब अच्छा चल रहा था पर अपने आप में पूरा ओएस नहीं बन पा रहा था। हर ओएस को एक पुल चाहिए होता है जो सॉफ्टवेयर और मशीनी पुर्जों के बीच बातचीत कर सके। इसे केरनल कहा जाता है। ग्नू के लिए कामयाब केरनल नहीं बन पा रहा था। जरूरत थी थोड़े सौभाग्य की।

ये सौभाग्य आया सन् 1991 में और अंधमहासागर के दूसरी तरफ फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में। लिनुस तोर्वालड्स नाम का एक छात्र दुखी था कि उसके काम का एक सॉफ्टवेयर केवल कुछ खास तरह के काम में ही इस्तेमाल हो सकता था। खार खा कर उसने खुद अपना एक केरनल का कोड लिखा, उसका नाम रखा ‘लिनक्स’। फिर उसे जांचपरख के लिए अपने मित्रों को भेज दिया। ये केरनल ग्नू में एकदम ठीक से बैठ गया। आखिरी कड़ी जुड़ गयी और तैयार हुआ एक ऐसा ओएस जिसके सोर्स कोड सबके लिए खुले थे, जो मुफ्त में किसी को भी दिया जा सकता था और जिसे कोई भी कंप्यूटर इजीनियर अपनी मर्जी के मुताबिक बदल सकता था, बशर्ते वो भी अपना काम निशुल्क आगे बढ़ाए।

इसे ग्नू/लिनक्स कहा गया और बहुत जल्दी ही इसकी प्रसिद्धी कंप्यूटर की दुनिया में फैल गयी। इसी समय इंटरनेट का चलन बढ़ने लगा था। ग्नू/लिनक्स पर चलने लगे बड़ेबड़े कंप्यूटर, जिन्हे सर्वर कहते हैं और जिनसे असंख्य बाकी छोटे कंप्यूटर जुड़े रहते हैं। पर इस सबके बावजूद ग्नू/लिनक्स केवल कंप्यूटर इंजीनियरों के ही काम का था। ग्नू/लिनक्स बहुत पक्का और मजबूत था क्योंकि ये ओएस उन लोगों ने बनाया था जो माइक्रोसॉफ्ट और ऐपल के ओएस की कमजोरी जानते थे। लेकिन थोड़ा ज्यादा ही शुद्ध था। ये इंजीनियर साधारण लोगों की कंप्यूटर से पूरी होने वाली व्याव्हारिक जरूरतों से कोसों दूर थे। चूंकि उन्होने ये अपने इस्तेमाल के लिए बनाया था, बेचने के लिए नहीं, तो उसके प्रचार प्रसार का सोचा ही नहीं था। माइक्रोसॉफ्ट की तरह उनके पास जनसंपर्क और विज्ञापन के लिए फालतू करोड़ो की संपत्ति भी नहीं थी।

इसमें कोई 10 साल लगे। कुछ कंपनिया समझ गयी कि ये माल बेहतर है और इसे सजा कर अगर बेचें तो कमाई भी हो सकती है। पर ग्नू का लाईसेंस एकाधिकार मना करता था। इसका रास्ता कुछ कंपनियों ने ये निकाला कि वो जो नई चीजे इजाद कर ग्नू/लिनक्स में जोड़ती थी बस उसका ही मूल्य ग्राहकों से मांगती थीं। एक और तरीका निकला। जो ग्राहक बने बनाए सॉफ्टवेयर में फेरबदल चाहते थे वो ग्नू/लिनक्स के इंजीनियरों को भाड़े पर रख लेती थी। एक शुद्ध सामाजिक प्रयोजन से बने ओएस से अब प्रवर्तकों की कमाई भी हो रही थी और उन्हे मुनाफा भी मिल रहा था। इनमें सबसे बड़ी कंपनी थी रेडहैट, जिसके काम से बहुत से लोगों को ग्नू/लिनक्स के आश्चर्यजनक खूबियों का पता चल सका।

लेकिन इस सब के बावजूद आम लोग घरों मे चलने वाले कंप्यूटरों में ग्नू/लिनक्स इस्तेमाल नहीं करते थे। साधारण लोगों को ये बहुत जटिल लगता था। जटिल ये था भी। माइक्रोसॉफ्ट और ऐपल के बारे में लोग बहुत जानते भी थे और उनके हजारों मुलाजिम इसी पर काम करते हैं कि उनके ओएस साधारण लोग कैसे चला सके। जरूरत थी एक अरबपति की जो अपना पैसा डाल कर ये काम करवाए।

ये व्यक्ति था मार्क शटलवर्थ। ग्नू/लिनक्स से सॉफ्टवेयर बना कर शटलवर्थ नें करोड़ो की कमाई की थी। 2004 में उसने इसमे से कुछ करोड़ से कैनोनिकल नाम की एक संस्था बनाई जिसका काम था ग्नू/लिनक्स से एक ऐसा औपरेटिंग सिस्टम बनाना जो साधारण से साधारण कंप्यूटर इस्तेमाल करने वाला भी चला सके। उन्होने बिल गेट्स की तरह लालच और हिंसा की कमाई से दुनिया को सुधारने का ठेका नहीं उठाया। केवल उस समाज को कुछ वापिस देना का बीड़ा उठाया जिसकी बदौलत उन्हे अमीरी और शौहरत मिली थी।

जब ये काम तैयार हो गया तो इस ओएस का नाम रखा गया उबुंटू। ये ।अफ्रीका की कुछ भाषाओं का शब्द है। उबुंटू का अर्थ है: दूसरों के प्रति सद्भाव। शटलवर्थ दक्षिण अफ्रिका से हैं जहाँ नस्लभेद और नस्ली हिंसा का विभत्सकाल बहुत लंबे दौर के बाद सन् 1990 के दशक में आकर कुछ थम पाया था।

अहिंसा के सहारे चलने वाले नेलसन मंडेला और डेसमंड टूटू जैसे नेता लोगों से उबुंटू के नाम पर शांति और भाईचारे की फरियाद किया करते थे। इतनी हिंसा और नस्लवाद के बावजूद लोगों ने उबुंटू की अपनी परंपरा भुलाई नहीं थी। मंडेला और टूटू की सफलता के पीछे जितनी गांधीजी की प्रेरणा तो थी ही, उबुंटू की भावना भी थी। उबुंटू जीवन के प्रति एक पूरा दर्शन है। एक तरह की संवेदनशीलता है जो कहती है कि एक मनुष्य का अस्तित्व उसके प्रियजनों से ही सार्थक होता है। शटलवर्थ नें नस्ली हिंसा भी देखी थी और उबुंटू की ताकत भी।

उबुंटू सबके लिए सुलभ है। और उबुंटू कंप्यूटर ओएस भी मुफ्त में वितरित होता है। अगर इसे पाने के लिए कोई शटलवर्थ को चिट्ठी या ईमेल लिख के भेज दे तो उसके घर पर उबुंटू पोस्ट से आ जाता है। उबुंटू से सरल और सुंदर शायद ही कोई कंप्यूटर ओएस हो। यह ग्नू/लिनक्स की दुनिया तो बनी ही इसलिए है कंप्यूटर की दुनिया को लोग अपने जीवन में अपनी जरूरत जैसे ढाल सकें। इसे दूसरी भाषाओं में बदलना बहुत ही आसान है। इसलिए बिना जनसंपर्क के उबुंटू बहुत तेजी से फैल रहा है।

आजकल बड़ी मँहगी कंपनियों से लेकर ताजे सामाजिक आंदोलन भी, सब के सब जनसंपर्क में लगे हैं। हर कोई दिखाना चाहता है कि उसके पीछे कितने हजार लाख उपभोग्ता और लोग खड़े हैं। नंबरों का ऐसा खेल गांधीजी नहीं करते थे। उन्होने जनसंपर्क से ज्यादा मनसंपर्क किया। तभी करोड़ो लोगों ने उन्हे वो जगह दी जो किसी और को नहीं मिल सकी। खुद नोबेल पुरस्कार देने वालों ने कहा है गांधीजी को नोबेल पुरुस्कार की जरूरत नहीं थी पर नोबेल पुरस्कार को गांधीजी की जरूरत थी। उन्होने कहा कि सवाल ये है कि गांधीजी के बिना क्या नोबेल पुरुस्कार अधूरा नहीं है?

ये होता है मनसंपर्क। और इसी मनसंपर्क की दुनिया से निकला है सामाजिकता का कंप्यूटर ग्नू/लिनक्स। ये उबुंटू का उपहार देता है। हमें अपने पड़ोसी के प्रति सद्भावना की, मनुष्यता की याद दिलाता है। कंप्यूटर की दुनिया का ये अहिंसक, सत्याग्रही और सामाजिक संस्करण है। नई पीढ़ी की सामाजिकता आजकल कंप्यूटरों पर सिमट गयी है। उन जालों को साफ करने के लिए मनसंपर्क का यह नया कंप्यूटर एक रामबुहारी है, एक सीधीसादी, सरल झाड़ू है।

लेकिन सामाजिकता का ठीक रूप तो कंप्यूटर के बाहर ही है। मनसंपर्क का सबसे पुख्ता तरीका तो पुराना है। अपने पड़ोसी को ईमेल भेजने के बजाए उससे मिलिए या हाथ का पत्र लिखिए। सुखदुख पूछिए।

इससे बड़ा मनसंपर्क किसी फेसबुक से नहीं मिलेगा।

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Categories: Media, Technology

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