दुनिया का खेला – भाषण

[16 अगस्त 2013 को साहित्य अकादमी में दिया
अनुपम मिश्र का नेमिचंद स्मृति व्याख्यान]

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मैं उनसे कभी मिल नहीं पाया था। सभा गोष्ठियों में दूर से ही देखता था उन्हें। अपरिचय की एक दीवार थी। यह कोई ऊँची तो नहीं थी पर शायद मेरा अपना संकोच रोके रहा आगे बढ़ कर मिलने से। आज उनकी स्मृति में हम सब यहां एकत्र हुए हैं। उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ।

नाटक उनका संसार था। मैं प्राय: नाटक जा नहीं पाता था। औरंगजेबपन में नहीं। शायद जेब में ठीक पैसा न होना एक कारण था। मैं उनके नाटक संसार से तो जुड़ नहीं पाया। पर फिर कुछ पुण्य रहे होंगे कि उनके परिवार से जुड़ता गया। आज इस परिवार की तीन पीढ़ियों का प्यार मुझे बिन माँगे मिला है। रिभु तक का।

अशोकजी ने कभी अंग्रेजी में एक सुंदर पंक्ति लिखी थी, एकदम नाटक वाली, वन्स अपॉन ए टाईम वाली शैली में। वे कहीं परिचय दे रहे थे मध्यप्रदेश का। पहला ही वाक्य था: वन्स अपॉन ए टाईम, देयर वॉज़ नो मध्यप्रदेश! उससे भी पीछे के काल में लौटें तो कहा जा सकता है कि कभी दिल्ली भी नहीं थी।

पर नाटक तो थे। ऐसा भी कह सकते हैं, नाटक तो था। यहाँ आप बहुवचन से हट कर एकवचन पर आ जाएं तो नाटक शब्द को मानो पंख लग जाते हैं। ज्यादा विस्तार, व्यापकता और गहराई इस एकवचन में आ जाती है। तो दुनया में नाटक था। दुनिया का खेला था। और इस खेला के बीच नाटक भी खेले जाते थे। कोई हजार बरस पुराने ये किस्से हैं पर लगेगा कि ये तो आज की ही बात है।

नाटक खेले जाते थे। कुछ उन्हें पसंद करते थे। और कुछ नापसंद भी। शुरु में किसी बात को नापसंद करने वाले थोड़े किनारे बैठते रहे होंगे तटस्थ। फिर वे बीच में बहने लगे होंगे। नाटकों में विघ्न डालने का, तरहतरह की रुकावटें डालने का नाटक भी शुरु हो गया था तब।

आज तो बहुत से ऐसे दल हैं, समूह हैं, जिनकी भावनाओं को चाहे जब, चाहे जहां, चाहे जिस बात से आघात पहुंच जाता है। तब वे अपनी आहत हो चुकी भावनाओं को शांत करने का एक ही तरीका जानते हैं, अपनाते हैं – अशांति फैलाना। नाटक हो, किताब हो, संगीत हो, कला प्रदर्शन हो सब पर एक ही तरीका लागू होता है।

तब की, कुछ हजार बरस पहले की परिस्थितयां क्या थीं, क्या पता हमको। पर नाटक शुर होने से पहले मंगलाचरण, विघ्न हरण की अनेक गतिविधियां सामने आने लगी थीं।

नाटक कैसे करें – यानी नाट्य शास्त्र की बारीकियां तो मोटेमोटे ग्रंथों में लिखी ही गई थीं। पर विघ्न न आएं, उपद्रव न हो जाए, इसका भी पूरा शास्त्र रचा जाने लगा था, उस समय।

और जैसा कि उस समय का चलन था यह सारा काम काला चश्मा पहने, (कल टी.वी. पर सबने खूब देखा है) हाथ में बंदूक ताने कठोर चेहरे वाले, कहीं शून्य में ताकती संदेह भरी आंखों के बदले, ब्लैक कमांडो के बदले सरल, सौम्य, रम्य सूत्रधार के हाथों में सौंपा जाता था। सूत्रधार नेपथ्य से रंगभूमि में, रंगमंच पर प्रवेश करता। उसकी इस क्रिया का नाम थाः रंगावतरण। उसके साथ एक तरफ पूर्ण कलश यानी जल से भरा कलश लिए एक सहायक होता तो दूसरी तरफ एक सहायक ध्वजा लिए आता। अब सूत्रधार कितने पग आगे बढ़ेगा, कितने पग दांए, कितने बांए, इस सबका पूरा हिसाब, पक्का गणित आ सकने वाले विघ्नों के प्रकारों को मानो किसी अदृश्य तराजू पर तोल कर लगा लिया जाता था।

यह सब काम गुस्से से, कठोर मुद्रा बनाकर नहीं, बहुत ही ठुमकठुमक कर, अभिनय, संगीत, प्रकाश की मदद से खूब आनंद के साथ किया जाता था।

कहने को अभी नाटक शुर ही नहीं हुआ है पर विघ्न विनाशक नाटक तो जारी ही है। कलश के जल से सूत्रधार पूरी रंगशाला और मंच को शुद्ध करते हैं, आचमन करते हैं। फिर बारी आती है ध्वज की।

आज बहुत कम लोगों को यह याद रह पाया हो कि इस ध्वज का एक विशेष नाम होता था। काम तो विशेष था ही। इसे जर्जर ध्वज कहते थे। आज की हिंदी में इसका मतलब कुछ ऐसा लगेगाः फटा हुआ झंडा। पर भला फटा हुआ, जर्जर ध्वज फहराकर कोई क्यों नाटक करेगा? यह तो एकदम भव्य झंडा होता था। ठाठ से लहराता हुआ। इसे उठा कर पूरे रंगमंच पर इस कोने से उस कोने तक घुमा कर सूत्रधार आ सकने वाले सभी विघ्नों को जर्जर कर देता था।

तो आज की इस बैठक के लिए भी हम एक जर्जर ध्वज फहरा ही दें न! अध्यक्ष महोदय की अनुमति से।

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इतना सब हो जाने के बाद भी नाटक शुरु नहीं हो पाता था। यह भी कहा जा सकता है कि उन दिनों सभी दर्शकों में अपार धीरज एक गुण की तरह व्याप्त रहता था। आप सबमें भी यह गुण है ही।

अब बारी आती एक विशेष नृत्य द्वारा भगवान शिव और विष्णु की पूजा अर्चना की। सूत्रधार बहुत ही ऊंचे दर्जे के अभिनय के साथ यह सारा काम करता। बांए पैर से विष्णुजी और दांए से शिव भगवान को स्मरण किया जाता। बड़ा ही कठिन काम होता यह। पहला पद वाम स्त्री का माना गया है और दूसरा पद दक्षिण पुरुष का। आज की भाषा में कहें तो जेंडर सेंसेटिव वाला कतर्व्य भी पूरा हो गया। उस काम में बात यहीं आकर समाप्त नहीं हो जाती थी। कहींकहीं क्षेत्र विशेष में एक तीसरा पद नपुंसक का भी रखा जाता था। लेकिन पैर तो दो ही हैं न। तीसरा कहां से लाएंगे? सूत्रधार तब दाहिने पैर को अपनी नाभि तक बहुत ही शानदार अभिनय के साथ उठाता। पार्श्व में बजता विशेष संगीत पूरा साथ देता। यह बहुत कठिन क्रिया होती थी। कभी अकेले में करके तो देखें!

नाटक अभी भी शुरु नहीं हुआ है। फिर सूत्रधार जर्जर ध्वज की पूजा चार तरह के विशेष फूलों से करता। तब बारी आती नाटक में इस्तेमाल होने जा रहे तरहतरह के वाद्य यंत्रों की पूजा की। ऐसा न हो कि वे प्रस्तुति के दौरान बेसुरे हो जाएं। उनके तार टूट जाएं या कि मृदंग उतर जाएं।

अब आई बारी नंदी पाठ की। उस समय भी ये राजा लोग हमारे आज के नेताओं की तरह, मुख्यमंत्रियों की तरह, खूब लड़ा करते होंगे। तभी तो हर नाटक के प्रारंभ में नांदी पाठ में बचे सब देवताओं को प्रणाम कर लेने के बाद सूत्रधार को अपने राजा की विजय की कामना भी करनी पड़ती थी। पता नहीं सभामंडप में राजा की ओर से कोई सेंसर अधिकारी बैठा रहता था यह सब देखने और कोई चूक हो जाने पर ऊपर तक चुगली करने।

आप सबके धीरज के लिए धन्यवाद। क्षमा भी मांग लें कि अभी आज का भाषण शुरु ही नहीं हो पाया है, पर नाटक तो चालू हो जाए पहले।

पर सब अब तक थक गए हों तो थोड़ा सुस्ता लें। ब्रम्हा भी थक कर सुस्ताने लगे थे। इतनी बड़ी सृष्टि का निर्माण करने के बाद, दुनिया का खेला रचने के बाद वे भी थक गए थे। उन्होंने भी सांस ली थी, थोड़ा आराम किया था।

सब धर्मों में दुनिया का खेला शुरु करने के बाद इसी तरह के किस्से मिलते हैं। ईश्वर ने सृष्टि की रचना छह दिन में पूरी कर डाली थी। तो फिर जो सातवां दिन आया, उस दिन छुट्टी रखी, जी भर कर आराम किया था। इसी में से बाद में रविवार की छुट्टी निकली। तुमने आराम किया प्रभु तो हम मुंशी लोग, हम अफसर लोग भी तो छह दिन काम करके थक गए हैं तो अब सातवें दिन पूरा आराम करना है।

कुछ समाजों में, धर्मों में रविवार के बदले शनिवार है छुट्टी तो कहीं शुक्रवार भी। पर है जरूर।

मुझे न तो संस्कृत नाटकों की इतनी बारीक परंपरा का कोई अंदाज था और न दुनिया के इस खेला का। शायद तब मैं आठवी में पढ़ता था। सन् 1959-60 की बात होगी। दिल्ली में कोई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह हो रहा था। उसमें एक हिस्सा बड़ी फिल्मों का था तो एक हिस्सा बहुत ही छोटी फिल्मों का। इतनी छोटी की हम सोच भी न पाएं। केवल तीन मिनट की फिल्मों का प्रदर्शन। ऐसी अनेक फिल्मों में से जिसे पहला पुरस्कार मिला था, उसे देखने का संयोग मेरा हाथ लग गया था। न जाने कैसे।

वहां रंगशाला में मैंने झांक लिया है, नाटक अभी भी शुर नहीं हो पाया है। इसिलए इस तीन मिनट की फिल्म को भी झटपट देख लें हम सब। यह फिल्म कैनेडा के किसी महान निदेशक ने बनाई थी। तब बच्चा ही तो था। अंग्रेजी के नाम याद नहीं रख पाया था।

फिल्म शुर होती है कैनेडा की एक झील के दृश्य से। सुंदर नीला पानी। तब वैसे भी हमारे जल स्रोत इतनी बुरी तरह से प्रदूषित नहीं थे। झील में एक नाव तैर रही है। नाव में एक पितापुत्र बैठे हैं। पिता चप्पू खे रहे हैं, 6-8 बरस का बेटा उन्हें निहार रहा है। इस उमर में प्राय: सभी बेटों को अपने पिता बड़े अच्छे लगते हैं।

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कैमरा ऊपर उठता है। अब पूरी झील दिखने लगती है। कैमरा और ऊपर जाता है। झील के किनारे बने सुंदर घर आते हैं परदे पर। फिर और ऊपर। पूरा मोहल्ला, फिर और ऊपर उठता जाता है कैमरा। पूरा राज्य, पड़ौसी देश अमेरिका, फिर दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, एशिया, लो पूरी गोल सुंदर हमारी धरती। कैमरा अभी भी उठता जा रहा है। फिल्म शुर हुए अभी एक मिनट भी नहीं हो पाया है। बगल से चांद झांक गया, अब अन्य ग्रह, शनिचर आदि, जिनसे आजकल लोग बहुत डरने लगे हैं और कुछ टी.वी.चैनल शनि महाराज की शांति करवाने में विशेष योग्यता भी रखते हैं। खैर।

हमारा सौर मंडल, हमारे सौर पिरवार के सभी सदस्य अगलबगल से निकलते जाते हैं। अब हमारी आंखों के सामने हमारी आकाशगंगा आने लगी है – अनिगिनत तारे, सूरज से छोटे और सूरज से बड़े भी। फिर और आकाशगंगाएं। डेढ़ मिनट भी अभी नहीं हो पाता है कि पूरा परदा असंख्य झिलमिल सितारों, तारों, बिंदुओं से ठसाठस भर जाता है। कहीं कोई जरासी भी जगह नहीं बचती।

विराट दर्शन!

अब कैमरा बड़ी ही तेजी से वापस आने लगता है नीचे। उसी रास्ते। सब दृश्यों को वापसी के क्रम में दिखाते हुए वापस झील पर। झील में अब नाव पर। नाव में चप्पू खेते पिता के हाथ पर। हाथ पर बैठा है एक मच्छर। अब मच्छर के डंक से कैमरा खून में जाता है। खून की नस में दौड़ रहे हैं लाल कण, सफेद कण। अब वह विराट दर्शन की तरह सूक्ष्म दर्शन कराता जाता है। जितना वह ऊपर गया था, उतना ही वह शरीर में भीतर उतरते जाता है।

आज सन् 2013 में इस विषय के जानकार बताते हैं कि हममें से हरेक के शरीर में कोई 90 लाख करोड़ जीवाणु, सूक्ष्म जीव रहते हैं। यही अपने आप में कितना बड़ा खेला है। हम एक विचार पर बनी एक ही संस्था में 20-25 लोग, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, कवि, लेखक एक साथ नहीं रह पाते। एक दूसरे से लड़तेझगड़ते रहते हैं पूरा जीवन। और ये हैं 90 लाख करोड़ हमारे साथी जो पूरा तालमेल बिठा कर हमारे इस शरीर को टिकाये रहते हैं। तो दुनिया का एक बहुत बड़ा खेला तो हमारे अपने इसी चोले में खेला जा रहा है। कुछ लोग हजारों बरसों से आत्मा की खोज कर रहे हैं। क्या पता यही आत्मा हो?

तो न यह सूक्ष्म जगत हमें पकड़ में आता है न वह विराट जगत। इन दोनों का गणित हमारे किसी भी गणित से परे है। दूरियां प्रकाश वर्श में नापी जाती हैं और फिर भी हम उन्हें माप नहीं पाते। दसपांच बरस में एकाध बार अपनी धरती से सिर्फ 80-90 किलोमीटर ऊपर जाकर ऊपर जाकर हम अपने विज्ञानज्ञान की शान बघारें यह करीबकरीब मूरखपना ही है।

इसी मूरखपने में से निकली यह समझदारी इस तीन मिनट की फिल्म देख कर। इसे देख दूरियां क्या हैं यह भी हम भूल जाएंगे और नजदीकियां क्या हैं, विराट क्या है, सूक्ष्म क्या है, इस सबकी परिभाषा भी बदल जाती है। किसी मौके पर घोंघे की गति हवाई जहाज से भी तेज लग सकती है।

एक जीवाणु है जो हमारी आंख की पुतली में रहता है। उसका काम पुतली की सफाई करते रहना है। दिन भर हम अपनी आंख में कितना कचरा, धुंआ, धूल झोंकते हैं, कई बार दूसरों की आंखों में भी – यह सारी सफाई यह जीवाणु करता है। इस पुतली की छोटीसी दुनिया का खेला बहुत जोरदार है। जब हम जागते हैं तो यह जीवाणु सोता रहता है। गहरी नींद। इसे तेज रोशनी, शोरशराबा कुछ तंग नहीं करता। आराम से सोता है – पूरी रात जो नौकरी करनी है इसे। हमारी पुतली है ही कितनी बड़ी। एक सेंटीमीटर से भी कम। हमारे सोते ही यह जाग जाता है, अपना काम करने।

कई हिंदी अखबारों में, जनसत्ता में नहीं, ग्रामीण खबरों में एक शब्द आता है : फलां थानांतरगत गांव। ये पुतली का थानेदार अपने अंतगर्शत आने वाले एक सेंटीमीटर के गांव का पूरा चक्कर बड़ी मुस्तैदी से लगाता है – कई घंटों में एक सेंटीमीटर की भागदौड़ पूरी कर लेता है। उसे भगवान की तरह, हमारी तरह रविवार भी नहीं मिलता। जन्म से मृत्यु तक वह काम ही करता रहता है।

आपकी अनुमति हो तो हम एक बार फिर रंगशाला में झांक लें। लीजिए विस्तृत नंदी पाठ सम्पन्नि हो गया है और अब हमारे सूत्रधार कुछ ऐसी बातों की सूचना विदूषक के साथ दर्शकों को दे रहे हैं जो उस जमाने की चलती बातें, ब्रेकिंग न्यूज़ होंगी। ठीक सुनाई तो नहीं दे रहा पर वे बालू की भीत और पवन के खंबे की बात कर रहे हैं शायद। सूत्रधार का ध्यान एकदम ताजी घटनाओं पर चला गया है। रेत की दीवार में से बीच की विभक्ति ‘की’ हटा दें। बचा क्या रेतदीवार, रेत और दीवार। पवन का खंबा में से क्या जोड़ें, क्या हटाएं, उसे अभी यहीं छोड़ दें। बस पवन से ही काम चला लें अभी।

ऐसे प्रसंगों से सूत्रधार नाटक की कहानी का बीज बो देते हैं आने वाले कथानक की तरफ दर्शकों को एक संकेत दे कर। फिर धीरेधीर इसी बीज के सहारे कथानक का पूरा वृक्ष खड़ा होने वाला है।

अब तक अनेक देवताओं की स्तुति, वंदना हो चुकी है। अब तो बारी है उस विशेष देवी या देवता की जिसको केंद्र में रख कर आज का नाटक खेला जाना है। तो क्या पता थोड़ी ही देर में हमारे ये सूत्रधार दुर्गा की वंदना करने जा रहे हों। बाद में जानकारी लगेगी कि रेत और दीवार का उनसे कुछ न कुछ संबध भी निकल ही आया है।

आजकल सबके पास एक रिमोट कंट्रोल रहता ही है। आप भी चाहें तो उसका बटन दबा यह भाषण यहीं रोक सकते हैं, वह भाषण जो अभी शुरु ही नहीं हो पाया है। बटन संकोच में नहीं दबाते आप तो अब जरा जल्दीजल्दी आगे बढ़ें।

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सूत्रधार ने बीज बो ही दिया है तो आगे बढ़ें, इतनी बड़ी दुनिया का खेला बनाते समय ब्रह्मा को भी खूब सारी रेत की जरुरत पड़ी होगी। वे रेत कहां से लाए होंगे? यह तो आज तक पता नहीं चल पाया है। पर जब खेला बन कर तैयार हो गया तो कुछ रेत बच गई। अब उसे कहां रख दिया जाए? ऐसा लगता है ब्रह्मा उसे थार के रेगिस्तान में छोड़ आए होंगे। कितनी मात्रा होगी उस रेत की? मत पूछिए। श्री ओम थानवीजी वहीं से हैं। ठेठ रेगिस्तान, थार के बीच बसे फिलौदी शहर से। कोई 30 बरस पहले उन्हीं ने हमें कभी उंगली पकड़ कर और कभी अपनी मोटर साइकिल पर पीछे बिठा कर उस सुनहरी भव्य रेत के दर्शन कराए थे।

उस बची रेत से नोएडा, ग्रेटर नोएडा तो छोड़िए, फिर से एक बार नई सृष्टि का निर्माण हो सकता है। पर इतनी दूरी से उसे लाएं कैसे, किस भाव पड़ेगी? खर्च कौन भुगतेगा? इतना खर्च कर कौन सा माफिया अरबपति बन पाएगा? तब आपके पैर के नीचे से ही रेत क्यों न निकाल ली जाए। सूत्रधार इस आशंका से घबरा जाता है। वह इसे रोकने की कोशिश करता है। नएनए विघ्न आते हैं उसके इस सत्कार्य में। वह एक बार फिर जर्जर ध्वज की स्तुति प्रारंभ कर देता है।

मुझे ठीक याद नहीं कि नाट्य शास्त्र नामक यह ग्रंथ कब लिखा गया होगा। पर विद्वान बताते हैं कि तीसरी शताब्दी में, यानी आज से कोई सत्रह सौ बरस पहले इस ग्रंथ को नए सिरे से सजायासंवारा गया था। संपादित किया गया था।

कुछ अनावश्यक प्रसंग हटाए गए थे, कुछ उस जमाने के हिसाब से जररी प्रसंग जोड़े भी गए थे। इसी ग्रंथ का एक पूरा अध्याय नाटक के प्रारंभ की तैयारियों का विशद विवरण करता है। हमारे सूत्रधार ने जो कुछ भी अभी तक किया है वह इसी ग्रंथ के बारहवें अध्याय पर आधारित है।

यहां साहित्य, प्रकाशन जगत से जुड़े कई लोग बैठे हैं। उन्हें जान कर अच्छा लगेगा कि इसी विषय पर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने श्री पृथ्वीनाथ द्विवेदीजी के साथ ‘नाट्य शास्त्र की भारतीय परंपरा और दश रूपक’ नाम की एक सुंदर पुस्तक लिखी थी। इसे आज से ठीक पचास बरस पहले सन् 1963 में राजकमल ने छापा था। दाम था दस रुपया।

वापस दुनिया के खेला पर। पचास बरस भूल जाएं। ये इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार आदि जो गिनती हम सब जानते हैं उनसे परे है। अरबखरब ही नहीं, गिनती बताने वाले पद, शंख जैसे नए शब्द इसमें गलीगली घूमते हैं। इन शब्दों को तो हमने किसी और संदर्भ में सुना भी है पर ऐसे भी शब्द हैं जिन्हें प्राय: हम सुन नही पाते। अन्त्य एक संख्या है और इसमें 1 के आगे 14 जीरो लगते हैं। 100,00,00,00,000,000 – इकाई, दहाई वाली शैली में शायद 100 खरब। इस गणित को आसानी से समझने के लिए बाद में दो और शब्द आए – अनादि और अनंत। न शुरु का कुछ पता न अंत का कोई ठीक हिसाब।

नाट्य शास्त्र हमारे हाथ आया कोई 17 सौ बरस पहले और दुनिया का खेला किस तराजू पर तुलेगा, उसके बांट कितने वज़न के होंगे वह सब कल्पना से परे हैं।

खगोल शास्त्र के मामले में जो विस्तार हैं, जो फैलाव है वह तो स्टीफिन हॉकिंग ही जाने पर जिसे हम कूपमंडूक कह कर उसका मजाक उड़ाते हैं, हमारे कुंए के उस मेंढक को आकाश जितना दिखता है, हमें भी उससे ज्यादा इसका कुछ पता नहीं। हम उन्ही दो शब्दों को अनादि और अनंत को दुहरा कर अपनी विद्वत्ता झाड़ देते हैं।

अनगिनत अभिनेता, नायक, एक से बढ़ कर एक किस्से कहानियां, वो भी हर रोज जुड़ने वाली और पूरी धिरती पर फैला शानदार रंगमंच। इस खेला में दर्शक, अभिनेता का अंतर भी मिट जाता है। कभी हम अभिनय करते हैं तो कभी हम अभिनय देखते रह जाते हैं। फिर एक ही आदमी के कई रूप हो जाते हैं यहां बहुरूपिया।

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निदेशक कौन है? विज्ञान और धर्म में अभी तक ठनी है। पिछले दिनों ईश्वर का कण भी यूरोप की आधुनिकतम प्रयोगशाला में खोजने का दावा किया गया है। नए पुराने कवि जरूर इसका उत्तरदे देते हैं – कभी निदेशक राम हैं तो कभी गोपाल हैं तो कभी रामगोपाल जी! ये निदेशक इतने भारी भरकम कि दुनिया का खेलाका पूरा ठेका बस इन्हीं की कंपनी के पास। सबको बस ये ही नचाते हैं: सबही नचावत रामगोपाल।

इस विशाल खेला में हम सब सजधज कर एक से एक बहुरूपिए बन कर उतरते हैं, अपनी भूमिका खोजते हैं। कभी अच्छी, कभी खराब। कुछ का खेला ठीक से पूरा हो जाता है। कुछ का अधूरा छूट जाता है। कुछ का जीवन की कहानी के किसी खास मोड़ पर आ कर अटक जाता है, भटक जाता है।

तो जीवन के इस खेले को अच्छे से खेलते जाने के लिए ठीक आंख चाहिए। ठीक पांख, पंख चाहिए। इस आंखपांख का संतुलन साध कर रखना पड़ता है। नहीं तो ऊंची से ऊंची, बड़ी से बड़ी जगह पर पहुंच कर भी हम ऐसे गिर पड़ते हैं कि फिर उठाए नहीं उठ पाते। भौतिक रप से गिरते ही हैं, हम अपनों की नज़रों में भी गिर जाते हैं। यह गिरावट हमारे खेला में कैसी फांक लाती है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हमारे अभिनय में जरासी भी कमी, कसर रह जाए तो हमारे परिवारों को, हमारी संस्थाओं को, देशों को कितना भोगना पड़ता है यह सब जानते हैं, बूझते हैं। फिर भी जानतेबूझते इस अभिनय की खोट से कई बार विरतनहीं हो पाते हम।

अपने इन दोनों निदेशकों को ही देख लें जरा। इन दोनों ने हमें तोनचाया ही। पर जब वे खुद इस खेला में अवतार लेकर आए, उनका रंगावतरण हुआ, तो वे भी नच गए थे। इन दोनों के जीवन में भी कैसीकैसी फांक पड़ी थी – खास कर अंत में।

रामजी के साथ मर्यादा और पुरुषों में उत्तम जैसे विशेषण, गुण जुड़े ही हुए थे। जब तक आंख और पांख सही रहे तो रावण रथी, बिरथ रघुबीरा भी चल गया। ऐसा बेमेल युद्ध भी राम जीत गए। पर, आंखपांख का संतुलन बिगड़ा नहीं कि उन्हीं के लाड़ले बेटों नेउनका घोड़ा, अश्मेधका घोड़ा रोक लिया था। पूरा जीवन लोगों से, एक से एक समर्पित भक्तों से घिरे रहने वाले राम का अंत अकेलेपन में हुआ। सन्नाटे में हुआ। सरयू नदी में जल समाधि से हुआ। शायद ऐसी ही अनंत घटनाओं को देख दुनिया का खेला की तुक से मैं हूं अकेलासे जोड़ते रहे हैं कवि लोग।

श्री कृष्ण की लीला तो लीला ही है। लीला अपरंपार। पर दे खें कि वे अपनी छोटीसी उंगली से इंद्र का क्रोध निपटा देते हैं, गोवर्धन उठा कर किसी और के बसाए गए गांव को बाढ़ से बचा लेते हैं। पर उनकी खुद बसायी भव्य नगरी द्वारिका समुद्र में डूब जाती है। उसे वे बचा ही नहीं पाते।

अपिचः। संस्कृत नाटकों में उदाहरणों के बाद और उदाहरण देते समय अपिचः कहा जाता है। तो वह भी सुन लें। जिसने महाभारत के युद्ध में दोनों तरफ से तरहतरह के शक्तिमंत्रपुष्ट तीरों की वर्षा सह ली हो, वह जरा नाम के – नाम पर ध्यान दें – जरा नामक बहेलिए के मामूली से तीर से अपने प्राण गवां देता है। दुनिया का खेला, कृष्णजी भी अकेला।

तो इस शानदार खेला में किसी भी चीज की कमी नहीं – इसमें से चाहे जितने किस्से निकाल लो, चाहे जितने किस्से इसमें जोड़ दोयह उपनिषद् के शब्दों में हमेशा पूर्ण ही बना रहता है।

नाटक में नौ रस हैं, दुनिया का खेला में भी नौ रस तो हैं ही भाईपर इनमें नाटकों के अतिरिक्त एक रस और जुड़ गया है। आप सब भी हैरान होंगे कि नौ के दस कैसे हो गए। इस रस का नाम है गन्ना रस! गन्ने का रस भी मिल जाता है। कैसे ? आपने गन्ने का रस ठेले पर सामने खड़े होकर पिया ही होगा। पहले साबुत गन्ना डालते हैं। फिर एक बार रस निकल आया तो उसी गन्ने को दो बार मोड़ कर फिर रस निकाला जाता है। फिर तीसरी बार दो के बदले तीनचार बार मोड़ कर अदरक, नींबू लगा कर फिर निचोड़ाजाता है। जब तक इन सारे छिलकों का रस न निकल जाए, दुकान वाला रुकता ही नहीं।

इस खेले की दुकान वाला भी हम सब का रस कभीकभी इसी शैली में निकालता है। इतना समय तो आपका बर्बाद नहीं करना है। पर दोचार रसों में गन्ना रस देख ही लें हम।

दुखसे शुरु करें। करुण रस है नाटक में। और इस खेला में पेश है एक नमूना।

कोई साठ बरस पहले की बात है। एक बांसुरी वादक थे। श्रेष्ठ, पहले दर्जे के कलाकार। शायद उन दिनों के रेडियो पर भी बांसुरी बजाते थे। प्लेग फैली। परिवार में इनको मिला कर सात सदस्य थे। पत्नी मरीं रोग से। बहुत ही प्रेम करते थे। अर्थी उठा श्मशान। लौटते हुए सारे रास्ते रोते रहे। संभाला मुश्किल से। घर आए तो पिता मरे मिले। सूरज ढल गया था। रात भर शरीर घर में रहा। ये सामने बैठे रोते रहे। सुबह उनका संस्कार किया। लौटे तो मां जा चुकी थीं। एकदोतीन। अब आंसू रुक गए थे। वे स्तब्ध, मौन हो गए।

अगले तीन दिनों में तीन बचे सदस्य और गए। अंतिम सदस्य को अग्नि देने के बाद इनका न सिर्फ मौन टूटा, ये तो जोरजोर से हंसने लगे थेः अरे, बंसीवाले तू मेरी परीक्षा लेना चाहता है। ले, मैं भी सब कुछ छोड़ वृंदावन आता हूं। तेरी परीक्षा लेने।पूरी जिंदगी फिर वे वृंदावन की गलियों में घूमते हर छोटेबड़े मंदिर के सामने बांसुरी बजाते जाते।

हास्य रस में भी गन्ने का रस मिलेगा। लीजिए एकदम ताजी चीज़। नेलसन मंडेला का किस्सा है अभी कुछ दिन पुराना।आजादी की अद्भुत लड़ाई लड़ी। हममें से कुछ की आधी उमर बराबर बरस जेल में काटे। देश को आजादी दिलाई। फिर राष्ट्रपति भी बने। पूरी दुनिया में 95 के पूरे होने पर उनका जन्मदिन मनाया गया था और इसी सबके बीच उनके शहर की नगरपालिका ने उनके ऊपर बकाया बिजलीपानी का बिल भेज दिया है – दंड समेत कुछ छह लाख रुपए का।

कुछ हजार बरस पीछे लौटें। ‘सौ साल जिओ’, ‘जीवेम शरद: शतम’ का आशीर्वाद सबने सुना है। मृच्छकिटकम नाटक में नायकनायिका का नाम, उनके किस्से कई लोग जानते ही हैं। नाटक में एक चोर है, शर्विलक। नायक के घर में चोरी के लिए सेंध मार कर घुसा है। विदूषक को सोता देख आशीवार्शद देता हैः मैत्रेय, स्वपिहि वर्षशतम्। भैया, इसी तरह सौ बरस सोते रहना।

वीभत्स रस के भयानक उदाहरण तो इस खेले में भरे पड़े हैं। कभी का भी, कहीं का भी अखबार उठा लें। हंसते खेलते, खातेपीते विज्ञापनों के बीच पूरा अखबार इसी से भरा मिलता है।

पर वीभत्स रस काकिस्सा सुनना ही हो तो जनरल बट नेकेड का सुन लें। अफ्रीका के पश्चिमीदक्षिणी छोर पर लाइबीरिया नाम के देश से। वर्षों तक गृह युद्ध चला है यहां। इसमें एक पक्ष का सेनापति था जोशुआ। इसने अपने विरोधियों को मार कर उनके जिगर को काट कर नाश्ता भी किया था। पांचसात बरस के बच्चों तक की सेना बना डाली। इन बच्चों को युद्ध में घसीटने के लिए वह सबसे पहले बच्चों से उनके मातापिता की ही हत्या करवा लेता था। यह विचित्र सेनापित दूसरे पक्ष पर हमला करते समय बस पैर में सैनिकों वाले भारीभरकम जूते पहनता, हाथ में आग उगलती बंदूक, अंग पर कोई कपड़ा नहीं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ आदि की दुनिया में इसका दूसरा नाम पड़ गया था जनरल बट नेकेड, नंगधड़ंग सेनापति। जोशुआ ने अपने ही 20,000 लोगों को मारा था, वहीं के लोग, शायद कबीला, जाति अलग थी और शायद बोली भी। सभी देशों में नवनिर्माण की यही परिभाषा है आजकल! अब इस वीभत्स रस में एकदम से अद्भुत रस जुड़ता है।

खून से सने शिखर पर खड़े जोशुआ को बंदकों की कानफोड़ू आवाजों के बीच न जाने कहां से अंतरात्मा की आवाज सुनाई पड़ जाती है। वह बंदूक फेंक देता है। चल पड़ता है तीर्थ यात्रा पर। तीर्थ कौन सा? वे सब मुहल्ले, घर जिनमें घुसघुस कर उसने लोगों को मारा था। उनका जिगर परिवार के लोगों के सामने ही काट कर खाया था। सलाहकारों ने समझाया, ऐसा मत कर भूल कर भी। लोग छलनी बना देंगे तुम्हारी। इन रसों में अब वीर रस जुड़ता है एक नए रूप में। जोशुआ किसी की नहीं सुनता, बस अंतरआत्मा की सुनता है। गजब की हिम्मत। अब वह एकदम निहत्थे, सचमुच अपनी आत्मा के बल पर, उनके बीच जाकर हाथ जोड़ कर अपने पाप का प्रायश्चित करता है। उस पर कहीं भी हमला नहीं होता। वह लोगों के पैर छूता है, खुद रोता, दूसरे रोते।

हमारे ही देश के एक युवा फोटोग्राफर भी कोई कम हिम्मत नही दिखाते। उनका नाम है रायन लोबो। वे भी इसके पीछेपीछे कैमरा लेकर फिल्म बनाते हैं। ये है दुनिया का विचित्र खेला।

क्रोध में किसी पर चप्पल जूते फेंकना अब कोई नई बात नही बची है। जूता फेंकने वाला भी क्रोधी, जिस पर फेंका वह भी आगबबूला। पर एक खेला 1914 में दक्षिण अफ्रीका में खेला गया। जनरल स्मट्स उस समय पूरी दुनिया में फैले ब्रितानी साम्राज्य के सबसे बहादुर, सबसे कुशल, सबसे योग्य, सबसे सख्त और सबसे क्रूर प्रशासक माने जाते थे। खुद गांधीजी जैसे विनम्र व्यक्ति के शब्दों में वे सबसे धूर्तलोगों में गिने जाते थे। दक्षिण अफ्रीका में प्रारंभ हुए सत्याग्रह में इन दोनों के कड़वे प्रसंग कई हैं। जनरल स्मट्स ने इनको जेल में डाला था। शायद वे गांधीजी को मार डालना भी चाहते थे। न जाने कब गांधीजी की तेज आंखों ने उनके पैर का नाप लिया और उन्हें एक सैण्डल की जोड़ी अपने हाथ से बना कर भेंट की। जनरल स्मट्स ने बाद में कभी लिखा था कि उनके पैर इस योग्य नहीं थे कि वे इतनी पवित्र सैण्डल पहन सकें। क्रोध रस शांत रस में बदला और फिर ग्लानि तक में।

इस खेला में अक्सर हम सब को लगता हैकि हम जो काम करना चाहते थें, वो तो हमें करने ही नहीं दिया गया। तो ये अच्छा खासा जमाना जालिम जमाने में बदल जाता है हमारे लिए।

तालियां कब पिटती हैं जब आपके सामने नाम, गुमनाम नहीं, नाम और नम्बर लिखी बनियान पहने ग्यारह लोग रोकने को खड़े हों। तब आप गोल कर दिखाएं। तालियां तभी बजती हैं। विघ्न इस खेला में रोज आएंगे। गुमनाम भी, नंबर और नाम वाली बनियान पहने भी।

ऊपर कहीं दुनिया के खेला की तुकबंदी अकेला से की गई है। पर नया निवेदन है कि यह काम बस कवि पर हीं छोड़ें। हम और आप इस खेला को ठीक से खेलना चाहते हैं तो अकेला को अकेला ही छोड़ दें। दुकेला बनें। दूसरों का साथ लें, दूसरों का साथ दें। तिकेला, चौकेला से भी बढ़कर सौकेला जैसे नए शब्द ही नहीं, नए संबंध भी बनाएं। इस खेला को, भले ही वह आपको सौतेला बनाना चाहे, आप सौतेला न बनाएं। आगे बढ़ें, इस खेला को अपने गले मिला लें।

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रंगशाला चलें एक बार फिर। नाटक शुरु हो गया है। भोला मन सूत्रधार ने बीज रोप कर दर्शकों को नाटक का नाम भी लगभग बता दिया है। बालूभीतपवन। रेतदीवारहवा। और लो विघ्न शमन के इतने प्रयासों के बाद भी रंगशाला के सामने विघ्न आने लगे हैं। अच्छा हो हम सब भी वहीं चलें और सूत्रधार की कुछ मदद करें।



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