बोलती-चालती हिंसा

सोपान जोशी          [ यह लेख ‘गांधी मार्ग’ पत्रिका के जनवरी-फरवरी २०१४ अंक में छपा है ]

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क्या आप बोली में बोलते हैं या भाषा में? दोनों अपनी होंगी पर ऐसा माना जाता है कि बोली जरा छोटी होती है। उसका दायरा सीमित होता है। ऐसी कोई जुबान जब एक छोटे से इलाके में, एक खास समाज या वर्ग तक रुकी रहती है, तो उसे बोली कह दिया जाता है। भाषा उससे बड़ी मानी जाती है। उसका विस्तार विराट होता है। उसे बोलने वालों में कई तरह के लोग होते हैं, कई तरह के समाज, कई तरह के वर्ग।

बोली और भाषा के बीच की यह ऊँचनीच कई लोग शाश्वत सत्य मानते हैं। भाषा और समाज का शास्त्र समझने वाले एक अमेरिकी वैज्ञानिक इस विषय पर एक व्याख्यान दे रहे थे, जब उनसे एक श्रोता ने कहा थाः भाषा वह बोली है जिसके पास थलसेना और नौसेना हो।यानी जिसके पास सत्ता हो, हिंसक शक्ति हो, उसकी बोली भाषा कही जाने लगती है। और जो ताकतवर न हो उसकी भाषा बोली मान ली जाती है। भाषा विज्ञान में इस कहावत का आज भी बोलबाला है। उस श्रोता का नाम तो ठीक पता नहीं, पर बाद में यहूदी भाषाशास्त्री मैक्स वाएनराइख के नाम से यह कथन चल निकला था।

बोलचाल के इस वर्ग विभाजन में भाषा वह भैंस है जो लाठी वाले की होती है। इस उपमा को थोड़ा खींचे, तो बोली को किसी गरीब की बकरी भी कहा जा सकता है। पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सत्ता, लाठी या शब्दों के अर्थ तय करने की ताकत भी किसी एक व्यक्ति या समाज के पास बहुत समय तक बनी नहीं रहती। इसलिए भाषाबोली के इस वर्गभेद को भुलावा बनने में देर नहीं लगती। एक समय हमारे यहाँ संस्कृत जानना ही कुलीनता का लक्षण माना जाता था। फिर ऐसे दिन भी आए कि फ़ारसी राजकाज की भाषा बन गई। फ़ारसी जानने वालों के लिए तेल बेचना निकृष्ट मान लिया गया। यह कहने वालों ने अपने खाने के तेल का भी मोल नहीं किया। हाथ का कंगन, आरसीफ़ारसी तक की कहावतें दोचार पीढ़ी तक चलती रहीं।

फिर फ़ारसी का जमाना लद गया। राजकाज की भाषा उर्दू हुई। उस दौर में मीर और मोमिन की शायरी की समझ सभ्यता का सर्टिफ़िकेट बन गया। इसका असर आज की मुंबईया फ़िल्मों तक में मिल जाता है, जब खुशबू की उपमा उर्दू से दी जाती है। इसके बाद ज़माना आया अंग्रेज़ी का। साहब बन कर अंग्रेज़ी बोलना ही उच्चता का मानदंड हो गया। आज भी हर कहीं अंग्रेजी बोलने की कोचिंग क्लास के विज्ञापनों में बताया जाता है कि आत्मविश्वास तो तभी मिलता है जब फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलनी आ जाए। अंग्रेज़ी न जानने वालों को हीनता से ग्रस्त माना जाता है।

अंग्रेज़ी की तुलना में आई इस हीनता को स्वतत्रंता सेनानियों ने आज़ादी के बाद दूर करना जरूरी समझा। सन् १९४९ में संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा दिया। इस विषय पर बहस बहुत कड़वी हुई। जिन प्रदेशों में हिंदी नहीं बोली जाती वहाँ डर था कि हिंदी वाले उन पर हावी हो जाएँगे। हिंदी को राष्ट्रीयता की पहचान बनाना उन्हें अपने और अपनी भाषाओं के प्रति अविश्वास लगा। ऐसे राज्यों के कुछ लोगों को हिंदी की तुलना में अंग्रेज़ी ज़्यादा स्वीकार्य लगी।

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सन् १९५६ में नए राज्य बनाने का आधार था भाषा। तेलुगू बोलने वाले इलाकों को आँध्र प्रदेश में जोड़ दिया गया। कई प्राँतों में भाषा को ले कर दँगे तक हुए। बंबई शहर के महाराष्ट्र या गुजरात में जाने को ले कर जाने तक ली गईं। आज तेलंगाना आंध्र प्रदेश से मुक्ति चाहता है, और इसलिए भी जाने जा रही हैं।

हिंदी के राष्ट्र गौरव की गाथा भी कुछ ऐसे ही फीकी पड़ रही है। ऐसा मान लिया गया कि हिंदी को सेवकों और सेवक संस्थाओं की बैसाखी चाहिए। कुछ लोग अपने परिचय में हिंदी सेवीऐसे लगाने लगे कि जैसे यह कोई बी.., एल.एल.बी. जैसा तमगा हो। सरकारी विभागों में हिंदी पखवाड़ा मनाया जाने लगा। हिंदी दिवस भी मुकर्रर हुआ और हिंदी अफ़सरों के पद भी बने। इसी तर्ज़ पर उर्दू की तरक्की के लिए भी संस्थाएं बन गईं। हिंदी बढ़ाओ के साथ ही अंग्रेजी हटाओ के नारे लगने लगे।

इन नारों के शोर में सच की आवाज़ कहीं दब गई। लेकिन वह फिर भी अजीब से जामे में सामने आ खड़ा होता है। ऐसे कई हिंदी और उर्दू सेवी मिल जाएंगे जिनकी संताने अंग्रेजी में ही बात करती हैं। नौकरशाही में ऐसे कई लोग मिल जाते हैं जो हिंदी न के बराबर जानते हैं, लेकिन ऐसा कोई नहीं मिलता जो अंग्रेज़ी न जानता हो। केंद्र सरकार तो अंग्रेज़ी में ही काम करती है, चाहे वह संसद हो न्यायपालिका हो या कार्यपालिका। ज़रूरत पड़ने पर उसका बेहद घटिया हिंदी अनुवाद किया जाता है। ऐसा कैसे हुआ कि सरकार के संरक्षण, प्रचार और बढ़ावे के बावजूद सरकार के ही बड़े हिस्से में ही हिंदी और उर्दू की जगह नहीं बची? क्या हमारी देशभक्ति खोटी है?

भाषा और राष्ट्रभक्ति की इस होड़ में भाषा के स्वभाव की अनदेखी होती है। कोई भी भाषा किसी पेड़ की तरह होती है। जमीन के ऊपर जो तना और शाखाएं दिखती हैं कम से कम उतनी ही गहरी जड़ें जमीन के नीचे जाती हैं। किसी पेड़ की ही तरह जो दिखता है, उसका पोषण भी अदृश्य स्रोत से ही होता है।

या शायद और ठीक उपमा है नदी की। किसी भी जगह पर नदी का पानी किसी ऊपरी इलाके से आता है, क्योंकि पानी सदैव नीचे ही बहता है। ऊपर जाने के लिए उसे भाप बनना पड़ता है, जिसके लिए सूरज जैसे विशाल हीटर की ज़रूरत होती है।

पानी इस्तेमाल करने वाले को पता नहीं होता कि उसका पानी हिमालय के किसी हिमनद के पिघलने से आया है या किसी के खेत में गिरी बारिश के पानी का रिसाव है। वह उस पानी को अपना संवैधानिक अधिकार भी मान सकता है, या देवताओं का प्रसाद भी। लेकिन नदियों की धारा किसी संविधान की धारा से नहीं बहती, न ही बादल मौसम विभाग के नीति निर्धारण या श्वेत पत्र की बाट जोहते हैं, बरसने के लिए। उनका धर्म सूरज, तापमान, दबाव, हवाओं जैसे कारणों से तय होता है। बाजारवाद या साम्यवाद या समाजवाद या राष्ट्रवाद या किसी भी और वादविवाद से इन ताकतों पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। गाँधीवाद से भी नहीं।

कई पहाड़ों, जगंलों और खेतों पर गिरी बारिश के पानी के संगम से नदियां बनती हैं। एक दूसरे से मिलकर यह नदियां बड़ी हो जाती हैं। सबसे बड़ी नदी वह होती है जिसका दूसरी नदियों से सबसे ज़्यादा का संयोग होता है। अगर सागर से उलटी गंगा बहाएं तो गंगा का स्रोत गंगोत्री भर नहीं होगा। यमनोत्री भी होगा, तिब्बत में ब्रह्मपुत्र का स्रोत भी होगा। दिल्ली और बनारस और पटना जैसे शहरों के सीवर से निकलने वाला पानी भी होगा। कहने को गंगा बनारस या पटना में एक विशाल नदी है, लेकिन उसका पानी शिवजी की जटा से निकल कर नहीं आता है। वह बनारस के ही गटर की पैदावार होता है।

अगर हिंदी और उर्दू और संस्कृत और फ़ारसी को बड़ी भाषाएं माना जाए, तो यह तय है कि इनका संगम कई दूसरी भाषाओं से हुआ होगा। बल्की जो लोग इन भाषाओं को करीब से जानते हैं वे बताते हैं कि एक काल की संस्कृत या फ़ारसी दूसरे काल की संस्कृत या फ़ारसी से बहुत अलग थी। इन भाषाओं को लिखने के लिए अलगअलग काल में अलगअलग लीपियां का उपयोग हुआ।

अरबी बोलने वालों के राज में ईरान की भाषा अवेस्तन लीपि की बजाए अरबी लीपि में लिखी जाने लगी। अरबी में व्यंजन नहीं होता है, तो अरबी लोग इसकी जगह फ़या व्यंजन का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए वे ईरान के पार्स नामक इलाके में बोली जाने वाली भाषा को वे फ़ारसी कहने लगे। अरबी के संयोग से फ़ारसी अगर एक सिरे से टूटी तो समय के साथ एक नए सिरे से बनी भी। अगर कोई ज़ुबान दूसरी ज़ुबानों से टकराना बंद हो जाती है तो उसका बढ़ना रुक जाता है। ठीक उस नदी के जैसे जिसमें दूसरी नदियों का पानी मिलना बंद हो जाता है। उर्दू यह बात बखूबी बतलाती है।

उर्दूतुर्क भाषा का शब्द है और मतलब है इसका तंबू। मध्यकाल में सैनिक छावनियां तंबूओं में लगती थीं और उनमें कई इलाकों के सैनिक साथ रहते थे। तुर्क ज़ुबान बोलने वालों का वास्ता होता बृज या अवधी या फ़ारसी या अरबी या दूसरी कई भाषा बोलने वालों से। इस मुठभेड़ से एक नई भाषा तैयार हो गई, जिसमें व्याकरण तो था संस्कृत से जुड़ी भाषाओं का, पर जिसमें क्रियारूप संयोजन आया फ़ारसी से। शब्द तो भोजपुरी और अरबी से ले कर तुर्क और अवधी और न जाने कितनी भाषाओं के आ गए।

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फिर उर्दू राज की भाषा बन गई। न जाने क्या कारण रहा होगा। शायद इसका संबंध इससे था की राज करने वालों का उन दिनों सेना और सैनिकों से गहरा लेनदेन था। इसके बाद उर्दू दरबार की भाषा बनी, और इसे सीखना सत्ता के खेल का हिस्सा बन गया। कई गजब के कवियों ने उर्दू में लिखा, पर धीरेधीरे इसे पढ़ेलिखे, सुसंस्कृत लोगों की ज़ुबान मान लिया गया। साधारण लोगों के काम आने वाली एक जीवंत बोली सत्ता की सीढ़ी चढ़ कर किताबी भाषा बन गई।

आज कई लोगों को चिंता होती है कि उर्दू का चलन कम होने से वह गंगाजमुनी तहज़ीब ही मिट जाएगी जिसने हिंदू और मुसलमान समाजों को सौहार्द्र से रहना सिखाया। उन्हें यह भी डर लगता है कि इस भाषा के मिटने से वह सौहार्द्र भी मिट जाएगा। हो सकता है कि उनका डर सही हो। लेकिन यह भी हो सकता है कि जैसे उर्दू की पैदाइश ही साधारण लोगों के मेलजोल से हुई वैसे ही दूसरी ज़ुबाने भी खिल उठेंगी। उर्दू कोई अकेली तो नहीं है। उसकी कई बहने हैं, कई रिश्तेदार भी।

भाषा की बातचीत में हिंसा का एक कारण यह भी है। अपनी भाषा के सम्मान के लिए दूसरों की भाषा को नीचा दिखाना। कुछ लोग ऐसा कहते मिल जाते हैं कि अमुक भाषा ही दूसरी सब भाषाओं की जननी है। इसके पीछे एक भाव असुरक्षा का भी होता है। जिसे अपनी संस्कृति के दबने का डर हो वह उसे बढ़ाने के लिए आक्रामक भी हो सकता है, असहज तरीके भी अपना सकता है। ऐसे में झूठसच का भेद करने का विवेक जाता रहता है।

भाषा कोई पत्थर में जमा जीवाष्म नहीं है जिसका जनम तय करने के लिए रेडियोकार्बन पद्धति की जरूरत पड़े, केवल यह सिद्ध करने के लिए की पहले कौन आया। नदी की ही उपमा पर लौटें, तो हमारे यहाँ कहा जाता है कि नदी का स्रोत और साधु की जात नहीं पूछी जाती। बोलियों का आपस में संबंध जननी और संतान का नहीं होता। बहनों का होता है। कोई बहन उमर में बड़ी होती है, कोई थोड़ी छोटी।

हिंदी की आज की दुर्गति का कारण ऐसे में दिखने लगता है। पहले से कहीं ज़्यादा लोग आज हिंदी को अपनी मातृभाषा कहते हैं। क्योंकि हिंदी राजभाषा है। वर्ना ऐसे कई परिवार आज छत्तीसगढ़ी या बुंदेलखंडी या अंगी या मालवी को अपनी मातृभाषा बताते। अगर ऐसा होता तो हिंदी की नदी में मिलती कई नदियों का पानी दिखता। हिंदी का विराट रूप सब लोगों को एक साँचे में ढालने में नहीं है। यह भाषाई हिंसा होगी। हिंदी की भव्यता कई रूपों, कई ध्वनियों, कई तरह के लोगों को अपनाने में है। कई नदियों का पानी अपने में समाने देने में है।

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सरकारी हिंदी का राजभाषाई रूप इसका ठीक उलटा करता है। वह लोगों पर यह दबाव बनाता है कि वे अपनी भाषा छोड़ एक आई.एस.आई. मार्का हिंदी का ही उपयोग करें। यह कई तरह के लोगों पर अन्याय है। जिसे आज हिंदी का रूप माना जाता है उसकी पहली किताब सन् १८०३ में छपी थी। आज इस हिंदी का स्वरूप अनुवाद का हो चुका है। राज की असल भाषा तो अंग्रेज़ी है, पर उसकी जूठन का अनुवाद हिंदी में चलता है। और आप पाएंगे कि कई ऐसे अख़बारों में धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है जो अपने आप को राष्ट्रीय दैनिक कहते हैं।

अंग्रेज़ी से हिंदी को लेनदेन तो होगा ही, जैसा कि भाषाओं का होता रहता है। आज अंग्रेज़ी का चलन बढ़ रहा है तो इसलिए कि उसका सामना कई और भाषाओं से हुआ है। अंग्रेज़ी व्यापक भाषा बनती जा रही है। लेकिन अंग्रेज़ी की गाँठ में दोयम दर्ज़े की अनुवादी हिंदी खड़ी करना समझदारी नहीं है। उस हिंदी में वह आत्मविश्वास नहीं होता जो सहज व्यवहार से आता है। यह सहजता ही मातृभाषा में अभिव्यक्ति का सार है। उसमें घरेलूपन, अपनापन होता है। वह असुरक्षा नहीं होती जो किसी और की भाषा से होड़ करने से आती है। हिंसा असुरक्षित लोगों का सहारा है। इसका माने यह नहीं है कि दूसरी भाषाएं न सीखी जाएं। कई भाषाएं जानना सदा से विद्वता का लक्षण माना गया है। लेकिन बुनियादी शिक्षा तो मातृभाषा में ही हो सकती है। उस ज़ुबान में जिसमें कोई माँ अपनी संतान से बात करती है। फिर चाहे वह भाषा हो या बोली।

हिंदी का इस्तेमाल करने का सबसे पुराना लिखित वाकया अमीर खुसरो का मिलता है, जो कहते थे कि वे हिंदवी में लिखते थे। उसके पहले भी अपभ्रंश के रूप में हिंदी के स्रोत के कुछ चिन्ह् मिलते हैं। इस स्वरूप में देखे तो हिंदी भारत भर की भाषा हो सकती है। इसी रूप में हिंदी का इस्तेमाल बंबई की फ़िल्मों में होता है। इसीलिए तो इतने लोग इन फ़िल्मों को देखते हैं। मोल चुका कर। इन फ़िल्मों को देखने के लिए सरकार से अनुदान कोई नहीं माँगता।

हिंदी की सेवा इसी में है कि उसकी बहनों का मान किया जाए। इस अहिंसक संस्कार के लिए किसी सरकारी विभाग या विश्वविद्यालय के भाषा अनुसंधान विभाग की ज़रूरत नहीं है। केवल अपनी भाषा में बोलने और लिखने का आत्मविश्वास वापस लाना होगा। अपनी दुनिया की बात अपने संदर्भ में करने का भी। अगर हमने यह सब करने लायक काम नहीं किए तो बोलचाल की हिंसा, यह बोलतीचालती हिंसा थमेगी नहीं।

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1 reply

  1. “अपनी भाषा के सम्मान के लिए दूसरों की भाषा को नीचा दिखाना।”
    आप द्वारा लिखी इस पंक्ति के लिए मुझे लगता है कि व्यक्ति अपनी भाषा के सम्मान के लिए नहीं वरन् अपनी बोली के लिए दूसरों को नीचा दिखाता है अौर इसका मेनै कई दफा अनुभव किया है अौर खास कर यह समस्या हिंदी भाषी लोगों में ज्यादा है, बल्कि क्षैत्र विशेष के साथ ज्यादा है।
    मै राजस्थान से हुं जहां कहा जाता है कि हर चार कोस पर बोली बदल जाती है वहां भाषा से ज्यादा बोली मायने रखती है। आप द्वारा लिखित कथन “हिंदी की सेवा इसी में है कि उसकी बहनों का मान किया जाए।” यह ही समस्या है हम भाषा अौर बोली में न तो मान करते हैं न ही मानते हैं।

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