अपनी खूंटी पर टिका, एक सुनने वाला पत्रकार

…..

जी हां, पत्रकार ऐसा भी होता है जो सवाल कम करे, समझे जरा ज्यादा

…..

khejdi

…..

लगभग ४७ साल के उनके कामकाजी जीवन में अनुपम मिश्र का बहुत कहीं आनाजाना हुआ। इस पूरी अवधि में वे नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में ही अपना चिमटा गाड़े रहे। इस दौरान उनके बहुत से साथीसहयोगी आए, कुछ समय साथ रहे, और फिर कहीं और चले गए। वे जहां थे, वहीं बने रहे। उन्हें कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं थी, कहीं भी पहुंचने की जल्दबाजी नहीं थी। महत्वाकांक्षा उन्हें कहीं भी नहीं ले जा सकी। जैसा भी संसार उन्हें मिला था, उसे निष्ठा से निभाना और जतन से बरतना अनुपम मिश्र के स्वभाव का बुनियादी हिस्सा था। उलझी, बरगलाई, उलटतीपलटती दुनिया के एकदम बीच, वे ठीक अपनी खूंटी पर शांत भाव से टिके रहने वाले व्यक्ति थे।

अपनी साधारणता में स्थित रहने का ऐसा ठहराव असाधारण होता है। बहुत से लोग उनसे मिलने केवल इसलिए आते थे कि अपने जीवन की आपाधापी में थोड़ा मन का आराम पा सकें, कड़ी धूप से निकल कर शीतल छाया में कुछ पल बिता सकें। अनुपम मिश्र सभी से प्यार से मिलते थे, संबंधों का इतिहास हमेशा ध्यान रखते थे, किसी भी तरह के प्यार और सम्मान का आभार सदा ही अपने मन में रखते थे। वे अपने सभी प्रियजनों के मन के संपादक भी थे। अनुपम मिश्र शब्दों और लेखों का संपादन भी वैसे ही करते थे जैसे अपने मित्रों के विचारों का, उनके निर्णयों का, उनके कथनों का। धीरज से, उदारता से, प्यार से, सत्य से।

उनके दफ्तर में उनसे मिलने कुछेक मानसिक रोगी भी लगातार आते थे। अनुपमजी उनसे उसी घनिष्ठता से मिलते जैसी वे किसी निकट के मित्र के लिए रखते थे। ऐसे लोग जिन्हें उनके अपने परिजनों ने त्याग दिया था, अनुपमजी के पास वह घरोपा और स्नेह पाते जो उन्हें कहीं और नहीं मिलता था। इनमें ऐसे भी थे जो किसी भी दूसरे व्यक्ति पर भरोसा नहीं करते थे, अपनी बात केवल अनुपम मिश्र से ही करते थे। उनकी सरलता ऐसी थी कि अपना मानसिक संतुलन खो बैठे व्यक्ति को भी दिखती थी।

किसी भी तरह की बातचीत को बीच में छोड़ कर, वे अपने इन मित्रों से मिलने अपने कमरे के बाहर चले जाते थे। दूर से देखो तो प्रतीत होता था कि कोई गहरी बातचीत चल रही है। फिर जितनी बन सके उतनी मदद वे उनकी करते, और वापस अपनी कुर्सी पर आ कर बैठ जाते। कहते, “कुछ सामाजिक टैक्स हम सभी को चुकाने होते हैं।” सरकार को टैक्स भरने वाले तो आपको मिल जाएंगे, अपने सामाजिक काम को टैक्स की संज्ञा देने वाले शायद ही मिलें। वे यह भी लगातार जताते थे कि मानसिक संतुलन का बिगड़ना एक लॉटरी है, कभी भी, किसी की भी खुल सकती है। फिर विश्व साहित्य से मानसिक रोगियों पर लिखे अनूठे उदाहरण भी बताते, पर किसी साहित्यिक हस्ती के पढ़ेलिखे ठाठ के साथ नहीं। गलीमुहल्ले में चायपकौड़ी खाते हुए किस्सा सुनाने वाले किसी मित्र के भाव से। रूसी लेखक अंतोन चेखोव की प्रसिद्ध कहानी ‘वार्ड नंबर ६’ उन्हें बहुत प्रिय थी, प्रेमचंद की कई कहानियां भी। अपनी अनेक यात्राओं में साधारण ग्रामीणों के बताए किस्से भी। संस्कृत के सूक्त भी और पुरानी हॉलीवुड फिल्मों के संदर्भ भी।

उनसे ज्यादा ज्ञानी लोग आपको कई मिल जाएंगे। पर ऐसा तो कोई विरला ही मिलेगा जिसमें अज्ञान की समझ इतनी गहरी हो। उनकी मिट्टी में ज्ञान और अज्ञान का एक अनुपम बोध था। उन्हें यह सहज ही पता था कि हर व्यक्ति जो जानता है, उसकी सीमा है। ज्ञान और जानकारी एक तरह की सत्ता पैदा करते हैं, एक तरह का ‘क्लब’ बना देते हैं, जिसमें प्रवेश सीमित होता है। लेकिन ज्ञानी और जानकार लोग ही अच्छा काम करें ऐसा वे नहीं मानते थे। “बहुत मामूली लोग भी ऊंचा काम कर जाते हैं,” वे दुहराते थे। अनुपम मिश्र ऐसे किसी भी क्लब, केंद्र, पार्टी या विचारधारा के सदस्य नहीं थे। अगर उन्हें ऐसी विशेष जगहों पर किसी कारणवश जाना होता था, तो वे वहां यूं ही हो आते थे। उस मुकाम या उससे आने वाली सत्ता के प्रति उनके हावभाव में कभी कोई राग दिखता नहीं था।

ज्ञान के अहंकार से उन्हें डर लगता था, ऐसी सूझबूझ से भी जिसका अदम्य आत्मविश्वास दूसरे लोगों की समझ के लिए कोई स्थान न रखे। अनुपम मिश्र की वाणी में, उनके मन में, और उनकी बातचीत में लगातार एक तरह का संशय रहता था, एक तरह का संकोच। जो अपने को पता है उससे आगे क्या है? वे हमेशा अपने मन में गुंजाइश रखते थे, उसके लिए जो अपने से बड़ा हो। अगर कुछ ऐसा सामने आ जाए जो अपने जीवन, अपनी बुद्धी से परे है, तो उसे विनम्रता से ही देखते थे। आपको शायद ही ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति मिले जिसके मानस में अज्ञान के प्रति इतनी प्रतिबद्धता थी। विनोबा भावे से लेकर स्टुअर्ट फायरस्टीन जैसे नए वैज्ञानिकों तक का साहित्य उन्होंने इकट्ठा किया था, जो मनुष्य के ज्ञान की सीमा की बात करता है। यही नहीं, अपने अज्ञान में संतुष्ट रह कर भी अपना आचरण कैसे साफसुथरा, उपयोगी, और सुरुचिपूर्ण रखना, यह उनका खास ध्येय था।

अनुपम मिश्र बहुत ज्यादा पढ़ते नहीं थे, बहुत ज्यादा लिखते भी नहीं थे।

ऐसे अद्भुत अज्ञान के बिना शायद उन्हें उस विवेक के दर्शन नहीं होते जो हमारे साधारण जनमानस में रचाबसा है। पत्रकार बहुत से होते हैं, ऐसे भी जिनकी पत्रकारिता में सामाजिकता होती है। लेकिन ऐसी अनुपम पत्रकारिता आपको और कहीं नहीं मिलेगी जिसमें साधारण लोगों के प्रति, उनके व्यवहारिक ज्ञान के प्रति इतनी रुचि हो। वह भी सालोंसाल यात्राएं कर के, लोगों से उनके अपने परिवेश में मिल के, मिट्टीपानी के उनके सामाजिक संस्कार का आत्मसात करने के बाद।

किसी भी पत्रकार के लिए अनुपम मिश्र को यात्रा के दौरान काम करते देखना एक यादगार अनुभव रहता था। उनमें खोजी पत्रकार, या सत्ता प्रतिष्ठान को जानने वाले और उसकी बखिया उधेड़ने वाले रिपोर्टर की आक्रामकता का एक अंश भी नहीं था। वे बहुत सवाल नहीं करते थे, जबकि सवाल करना किसी भी पत्रकार का प्रधान औजार होता है। वे लोगों से ऐसे मिलतेजुलते थे जैसे अपने परिजनों से मिल रहे हों। उनकी सौम्यता सहज ही लोगों को आश्वस्त करती थी। उनका पहनावा, भाषा, आंखों का भाव ज्यादातर लोगों को निशस्त्र कर देता था।

पत्रकारिता का एक और गुण थाः ध्यान से सुनना। यह उनमें गजब का था। आज पत्रकारिता बहुत ज्यादा बोलने वालों का क्षेत्र हो गया है। अनुपम मिश्र सुनने वाले पत्रकार थे।

ऐसे तरीकों से किए काम का परिणाम गजब का था। अनुपम मिश्र को लोगों से वह सब पता चलता था जो किसी तेजतर्रार खोजी रिपोर्टर को भी नहीं मिलता। उनसे अनजाने लोग भी परिजन की तरह बात करते थे, उन्हें अपने घर के भीतर ले जाते थे, अपने मन के भीतर भी। ऐसे ही १९७० के दशक में वे उत्तराखंड के चमोली जिले में कुछ गांव वालों का विरोध समझने पहुंच गए। सरकार ने जंगल काटने का ठेका किसी क्रिकेट बैट बनाने वाली कंपनी को दे दिया था, लेकिन ग्रामीण अपने जंगल की रक्षा कर रहे थे। जिसे बाद में ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से जाना गया उस पर लिखने वाले शुरुआती लोगों में अनुपम मिश्र थे। चंबल घाटी में १९७२७४ में डाकुओं के समर्पण के लिए जो दल जयप्रकाश नारायण ने बनाया था उसमें प्रभाष जोशी और श्रवण गर्ग के साथ अनुपम मिश्र भी थे।

इसी दौरान नर्मदा घाटी में बांधों की वजह से बिगड़ती खेती ने जब ‘मिट्टी बचाओ आंदोलन’ का रूप लिया, तो उसकी आवाज दुनिया तक पहुंचाने का काम अनुपम मिश्र ने ही किया। बीकानेर में गौचर की रक्षा हो, कुएंतालाब के बचाव की बात हो, सार्वजनिक यातायात बढ़ाने की बात होहमारे पर्यावरण की बातचीत के हर सामाजिक स्वरूप में अनुपम मिश्र की अंगुलियों की छाप मिलेगी। इन सब विषयों और लोगों के पास वे दूसरे लोगों को भी ले कर गए। उन्हें कहीं ऐसा नहीं लगा कि उनकी लिखाई या उनकी रिपोर्ट उन्हीं की विशिष्ट मानी जाए।

अपने काम पर उन्होंने कभी सर्वाधिकार नहीं रखा। लोग किताब छपने के बाद लोकार्पित करते हैं, अनुपम मिश्र की किताबें लिखाई के पहले से ही लोकार्पित रहती थीं। कोई और उनके काम को अपनाए इससे अच्छा क्या हो सकता है, भला! “अगर अपनी ही बपौती बना लो और दुनिया सुधारने का ठेका अपना ही मान लो, तो सामाजिक काम दूर तक नहीं जा सकता। उसके लिए तो अपना और अपने समाज का संबंध ठीक होना जरूरी है। अपनी आंख, अपना भाव ठीक होना जरूरी है।” उनकी लिखी किताबों से दूसरे प्रकाशकों ने भी धन कमाया है, और इसे अनुपम मिश्र अपनी ही सफलता मानते थे।

जैसे अकादमिक ज्ञान की दुनिया से उन्होंने दूरी बना कर रखी वैसे ही पेशेवर पत्रकारिता से भी अनुपम मिश्र जरा दूर ही रहे। (हालांकि ऐसे संपादक और अखबार मालिक भी थे जो उन्हें बुला कर महंगी नौकरी देने के लिए तैयार ही नहीं थे, आग्रह भी करते थे।) इसका प्रभाव उनकी भाषा में दिखता है, जिसके बारे में न जाने कितने लोग कितनी प्रशंसा में कितने ही लेख लिख चुके हैं। उनके आखिरी १०१५ साल में उनकी जैसी प्रसिद्धी हुई उसका वे आभार मानते थे, पर उसे सहज ही लेते थे। जब कोई उनकी भाषा की प्रशंसा करते हुए भी कठिन और टेढ़ी भाषा का उपयोग करता, तो वे निजि रूप से चुटकी भी लेते थे। “जब पांव पर चलना इतना आसान है, तो लोग लिखते समय हाथ पर चलने की कोशिश क्यों करते हैं?”

जो कोई उनके संपादक के रूप को करीब से जानता था उसे पता था कि वे एकएक शब्द पर कितने नृशंस हो सकते थे। उनकी व्यवहार की सरलता के पीछे जटिलसेजटिल विचार को समझ लेने की गहराई भी थी। “अच्छी, साफसुथरी लिखाई, अच्छे, साफसुथरे विचार से ही आती है,” वे बारबार याद दिलाते थे। क्योंकि हमारे विचार भाषा में उभरते हैं, इसलिए विचार को ठीक करने का, ठीक रखने का माध्यम भी भाषा ही है।

कैसा विचार? ऐसा, जो सत्यनिष्ठ हो। किसी एक विचारधारा या किसी एक धर्म या किसी एक राजनीतिक दल के दरवाजे पर बंधा न हो। जिसकी निर्मलता सामने वाले के मन में झलके। जिसके विरोधियों को भी उसकी शीतलता का आभास हो। जिसमें पूर्वाग्रह न हों। बस सत्य के प्रति एक अनुपम आग्रह भर हो।

सोपान जोशी

[ लेख यथावतपत्रिका के ११५ जनवरी २०१७ के अंक में छपा है ]

Advertisements


Categories: Environment, Language, Media

Tags: , , , , ,

6 replies

  1. बहुत ही अनुपम लेख है अनुपम मिश्र पर। जिस प्रकार देसी ज्ञान के बूते भारत के पर्यावरणीय चिंताओं को उन्होंने अपने तमाम कर्मों से अभिव्यक्त किया वह अपूर्व हैं।

  2. A great Article on GREAT person…
    Thnks Sopan sir…

    वर्धा मे अापसे मुलाकात हुई थी… @धरामित्र
    फीर से मुलाकात होगी ऐसी अाशा करता हुॅं.

  3. Sopanji aapne bahut achcha likha hai.

  4. महान साहित्यकार, लेखक, चिंतक श्री अनुपम मिश्र जी का अचानक दुनियां से बिदा होना एक बडी छति है ! उनके अनुभव, किए गए कार्य हमारी युवा पीढी के लिए मागॅदशॅक साबित होगे

  5. Sopan bhai atayant anupam likha hai apne anupam ji par

  6. एक अनुपम व्यक्तित्व पर उतना ही अनुपम लेख! शुक्रिया सोपान भाई!

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: