साधारण-सा जीवन, दो असाधारण किताबेंः जोसेफ जेंकिन्स

[यह लेख ‘गांधी मार्ग’ पत्रिका के जनवरी-फरवरी 2013 अंक में छपा था।]

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सिर के ऊपर पारंपरिक स्लेट पत्थर की छत और पाँव के नीचे
अपने ही मल-मूत्र से बनी खाद। जोसेफ जेंकिन्स के दो प्रसिद्ध परिचय हैं।
15 साल पहले लिखी ‘द स्लेट रूफ बाइबल’ और 17 साल पहले लिखी
‘द ह्यूमन्योर हैंडबुक’। दोनों किताबों ने हजारों लोगों को प्रेरणा दी है।
क्योंकि वे दूसरों को बताते नहीं हैं कि उनकी नीति क्या होनी चाहिए,
उन्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। वे अपने असाधारण जीवन की
कथा सहज और सरल स्वर में सुनाते हैं।

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सोपान जोशी

जोसेफ जेंकिन्स की अहिंसक यात्रा एक युद्ध से शुरू हुई थी। उनके पिता अमेरिकी सेना में काम करते थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद वे जर्मनी में तैनात थे जब श्री जोसेफ का जन्म 1952 में हुआ। सेना की नौकरी में हर कभी उनका तबादला हो जाता। बालक जोसेफ हर साल-दो-साल में खुद को एक नए शहर में पाता, नए लोगों के बीच, नए संस्कारों में।
होश संभलने के साथ ही श्री जोसेफ को अमेरिका के वियतनाम पर हमले और कई साल से चल रहे युद्ध का भास होने लगा था। अमेरिकी सरकार स्कूल की पढ़ाई पढ़ कर निकले हजारों किशोरों को लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने अनिवार्य (या कहें जबरन) सैनिक सेवा में वियतनाम भेज रही थी। उस युद्ध को जोसेफ अमेरिका का सामूहिक पागलपन बतलाते हैं, जिसकी वजह से कई लाख लोग जान गँवा बैठे, अपंग और अपाहिज हुए, अपने घर-परिवार से हाथ धो बैठे। कई लाख एकड़ जमीन ‘एजेंट ऑरेंज’ नाम के जहर से बरबाद की गई और उस जहर की वजह से आज भी वियतनाम में कई बच्चे पैदाइशी अपंग और मंदबुद्धि हैं। वह युद्ध बहुत बड़ा झूठ और अन्याय था और अमेरिकी समाज ने आज तक उसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा नहीं दी है।
18 साल की उमर होने पर श्री जोसेफ की भी नौबत आनी थी सेना में भर्ती होने की। वे पेंसिलवेनिया राज्य में डॉक्टरी की शुरुआती पढ़ाई कर रहे थे। साल था 1972। एक दिन कॉलेज की कैंटीन में उन्हें एक अंजान आदमी आ मिला। उसने उन्हें एक सरकारी नियम के बारे में बताया जिससे कॉलेज में पढ़ रहे छात्रों को अनिवार्य सैनिक सेवा से छूट मिलती थी। उस व्यक्ति ने श्री जोसेफ से वह फॉर्म भरवाया और युद्ध के लिए जबरन भर्ती से उन्हें बचा लिया। अगले ही साल सरकार ने वह नियम खारिज कर दिया। श्री जोसेफ बाल-बाल बचे वियतनाम युद्ध में लड़ने से। वे आज भी उस अंजान फरिश्ते का आभार मानते हैं।
युद्ध की हिंसा से तो श्री जोसेफ बच गए, पर अपनी अंतरआत्मा से नहीं बच पाए। उन्हें यह मंजूर नहीं था कि उनकी कमाई से वसूले हुए कर का इस्तेमाल अमेरिकी सरकार युद्ध के लिए करे। उन्होंने गरीबी में रहने का प्रण लिया, ताकि उन्हें सरकार को कर चुकाना ही न पढ़े। वे कहते हैं कि इस घटना के 40 साल बाद आज भी अमेरिकी सरकार अपने नागरिकों से वसूले कर से निर्दोष लोगों को मारने वाले युद्ध अफगानिस्तान और ईराक में लड़ रही है।
अमेरिका से चिढ़े हुए वे यात्रा पर मेक्सिको की ओर निकल गए, यह समझने कि वहाँ जीवन काट सकेंगे या नहीं। छह महीने बाद ही वे वापस अपने घर वापस लौट आए, पेंसिलवेनिआ राज्य के एक छोटे से कस्बे में। पेशे की डॉक्टरी करने के लिए स्नातकोत्तर पढ़ाई नहीं करने का निर्णय तो वे पहले ही ले चुके थे। गाँव में एक परिचित की 212 एकड़ जमीन थी। उसने श्री जोसेफ के सामने प्रस्ताव रखा कि इस जमीन को वे ही संभालें। वहाँ रहने के लिए एक टूटा-फूटा घर था, उसकी मरम्मत जरूरी थी। उस साल श्री जोसेफ ने गर्मी में एक बड़ा बगीचा लगाया। इस जमीन से एक साल में ही उनका दाना-पानी उठ गया। पर तब से अब तक वे हर साल गर्मी के मौसम में बगीचे लगाते हैं।
इस दौरान श्री जोसेफ को छतों की मरम्मत करने के प्रस्ताव आने लगे। यह काम उन्होंने 16 साल की उमर में ही सीख लिया था, स्कूल से छुट्टी के दौरान। साल था 1968 और उनके पड़ौस के एक घर में सीमेंट का बना पक्का आँगन तोड़ कर मलबा हटाने की जरूरत थी। युवक जोसेफ कुछ जेबखर्च कमाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने हथौड़ा संभाला और देखते-देखते ही काम पूरा कर दिया। घर की मालकिन उनकी मेहनत से बहुत प्रभावित हुईं। उनके पिता थे पीट ओडरे, जिनका जमा-जमाया और प्रसिद्ध कारोबार था छत बनाने का। बेटी ने अपने पिता को बताया इस मेहनती युवक के बारे में।
उन्होंने श्री जोसेफ को अपने साथ रख लिया और उन्हें काम सिखाने लगे। इस दौरान श्री जोसेफ ने अमेरिकी घरों में लगने वाली तरह तरह की छतें करीब से देखीं और उन पर काम भी किया। उन्होंने पाया कि छत बनाने में इस्तेमाल होने वाला ज्यादातर माल पर्यावरण को दूषित तो करता ही था, ज्यादा समय चलता भी नहीं था। जैसे डामर या एसबेस्टस, जिससे कई तरह के रोग होने का खतरा भी रहता है। इन पदार्थों से काम करना श्री जोसेफ को कतई भाया नहीं।
वे उस दिन को याद करते हैं जब उन्होंने पहली बार स्लेट पत्थर से ढली छत देखी। जी हाँ, वही स्लेट का पत्थर जिससे एक समय लिखने की पट्टी बनती थी। युरोप और अमेरिका में बहुत पहले से कई जगह स्लेट पत्थर और कवेलू से छत बनाने की परंपरा रही है। स्लेट के टुकड़े सालों-साल जमे रहते हैं और उनकी छत बहुत लंबी चलती है। एक छत से निकाल कर स्लेट पत्थरों को दूसरी छत पर लगाना भी सरल होता है। शायद इसीलिए विज्ञापन और नएपन की लकदक में चलने वाली हमारी खरीदने-फेंकने वाली नई दुनिया को ऐसा टिकाऊ पदार्थ पसंद नहीं आता।
स्लेट के कई गुण तो श्री जोसेफ को बहुत बाद में समझ आए, पहले तो उन्हें यही दिखा कि इस पत्थर की बनी पारंपरिक ढलाई की छत दूसरे पदार्थों से बनी छत से कहीं ज्यादा सुंदर दिखती है। स्लेट के सौंदर्य का उनपर ऐसा जादू हुआ कि ने उन्होंने उसी दिन तय किया कि जब कभी अपना घर बनाएंगे, उसकी छत स्लेट की ही ढालेंगे।
यह मौका उन्हें 11 साल बाद सन् 1979 में मिला, कुछ पुराने घरों से निकाली हुई स्लेट का इस्तेमाल करने से। इस बीच बहुत कुछ और भी हुआ। उन्हें छत का काम सिखाने वाले पीट ओडरे चाहते थे इस मेहनती युवक को तैयार कर के उसे अपना कारोबार सौंप दें। पर दो साल छुट्टियों में उनका साथ देकर सन 1970 में श्री जोसेफ डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ने विश्वविद्यालय चले गए। वहाँ कॉलेज की फीस जुटाने के लिए उन्होंने घरों की मरम्मत करने का एक छोटा-सा कारोबार चलाया। फिर वे वियतनाम जाते-जाते बचे और कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद गरीबी में रहने का प्रण ले बैठे।

जब सन् 1975 में वे वापस घर आए, तब उनके शहर के लोग उस मेहनती युवक को भूले नहीं थे जो कारीगर पीट ओडरे का शागिर्द था। उनके पास स्लेट की छत ठीक करने का काम सहज ही आने लगा, जो उनके घरों की मरम्मत के काम में जुड़ गया। जल्दी ही उनके पैर जम गए और उनका कारोबार चल निकला। सन 1979 में उन्होंने सात एकड़ जमीन खरीदी और उस पर अपना घर बनाया, स्लेट की छत वाला। लेकिन पूर्वोत्तर अमेरिका की बर्फीली ठंड के छह महीनों में यह कारोबार रुक जाता है। तो उस दौरान श्री जोसेफ ने लिखना शुरु कर दिया। किस विषय पर? स्लेट की छत पर।

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पाँच साल के शोध के बाद सन् 1997 में उन्होंने अपनी किताब ‘द स्लेट रूफ बाइबल’ खुद ही छापी। लिखने की दुनिया में नए थे इसलिए उसमें कमियां भी रह गईं थीं। अपने लिखे की मरम्मत कर के उस किताब का दूसरा संस्करण उन्होंने सन् 2002 में छापा। इसकी हजारों प्रतियां बिक चुकीं हैं और इसका इंटरनेट संस्करण तो और भी चला है। इस किताब के छपने के बाद श्री जोसेफ के काम की खूब शोहरत फैली और उनके पास पुराने तरह की स्लेट छत बनवाने और सुधरवाने का ढेर-सा काम आने लगा। उन्होंने सन 2005 में छत का काम करने वाले कारीगरों का सामाजिक संगठन बनाया, जो खूब फल-फूल रहा है। इसकी एक पत्रिका भी निकलती है, पारंपरिक शैली से छत बनाने के सभी विषयों पर। खत्म होती हुई इस परंपरा को श्री जोसेफ के काम से खूब संबल मिला है, स्लेट का उपयोग बड़ा है। गरीबी में रहने का प्रण और डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ने वाले इस सिरफिरे को आज, लगभग 70 साल की उमर में एक सफल व्यक्ति माना जाता है।
अपनी जीवन यात्रा की बात करते हुए श्री जोसेफ डॉक्टरी की पढ़ाई की निर्थकता के बारे में बताते हैं। कहते हैं – “प्री-मेडिकल पढ़ाई में हमें खान-पान और स्वास्थ के संबंध पर कुछ भी नहीं पढ़ाया गया। मैं इतना अनाड़ी था कि मुझे तो पता भी नहीं था कि इन दोनों का कोई संबंध है।” कॉलेज से उत्तीर्ण होने के बाद उन्होंने खुद से इस विषय पर पढ़ाई की और इसकी ओर आकर्षित होते चले गए। अपना भोजन उन्होंने खुद उगाना और पकाना शुरु कि दिया। यह आज भी रोज होता है, हर रोज उन्हें कुछ नई और उपयोगी बातें समझ आती हैं। वे कहते हैं कि कॉलेज की पढ़ाई में उन्हें यह सब कभी समझ नहीं आता। तरह तरह की जड़ी-बूटियों के प्रयोग से उनके उपयोग भी समझ में आने लगा।
यह एक और दूसरी (और समानांतर) यात्रा रही है श्री जोसेफ की। इसकी शुरुआत हुई थी 1975 में, जब वे डॉक्टरी शिक्षा छोड़ के अपने परिचित के 212 एकड़ के खेत पर एक साल रहे। टूटे-फूटे घर को तो उन्होंने रहने लायक बना लिया था, पर यह पहली दफा था कि वे ऐसे घर में रह रहे थे जिसके शौचालय में पानी पाइप से नहीं आता था। वे शौच निपटने के लिए बाहर बने झोपड़ीनुमा शौचालय में जाते, जिसमें जमीन में खोदा एक गड्ढा भर था। चाहे कोई भी समय हो, मौसम कितना भी खराब हो, बारिश हो, बर्फबारी हो। गड्ढे में उनका रोज मुकाबला होता कई तरह के कीड़ों से। ततैया, मकड़ी, मक्खी और ढेर-सी दुर्गंध। इसका समाधान उन्होंने निकाला एक ढक्कनयुक्त चीनी-मिट्टी के कमोड से, जिसे खराब मौसम में घर के भीतर रखा जा सके। जब कमोड भर जाता तब उसे बाहर ले जाकर खाली कर देते।
कमोड के भीतर होने से घर में बदबू आती थी। फिर इसका उपाय भी उन्हें आसपास ही मिल गया। खेत पर लकड़ी के काटने से निकला ढेर सारा बुरादा पड़ा था। श्री जोसेफ ने पाया कि लकड़ी के बुरादे को ऊपर डालने से टट्टी और पेशाब की गंध चली जाती थी। इस तरह से ग्रामवास और एकांतवास का उनका पहला साल बीत गया।
उनके अगले घर में पानी और बिजली की कोई व्यवस्था नहीं थी। कोई नल नहीं, पाइप नहीं। वहाँ उन्होंने एक प्लास्टिक के डिब्बे को अपना शौचालय बना लिया और वही लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल करने लगे। लेकिन उस घर के बाहर समय-समय पर डिब्बा खाली करने के लिए कोई गड्ढे वाला शौचालय भी नहीं था। गर्मी के मौसम में श्री जोसेफ ने पास की जमीन पर बगीचा लगाया था, तीन और बगीचे लगाने का विचार उनके मन में था। इसके लिए पत्ते वगैरह सड़ा कर खाद बनाने के लिए उन्होंने एक ढेर लगा रखा था। कोई और समाधान था नहीं, सो डिब्बे की टट्टी और पेशाब को भी वे इसी ढेर में डालने लगे। वे कहते हैं उन्हें कुछ ठीक से पता नहीं था, कोई अध्ययन या अनुभव नहीं था। सामने जो मुश्किलें आ रहीं थीं उनका व्यवहारिक हल खोजना भर उनका ध्येय था।

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यह बात 1977 की है। तब से आज तक श्री जोसेफ हर साल बगीचा भी लगाते हैं और उसमें जो खाद डालते हैं वह उनके मल से ही तैयार होती है। उनके बगीचे में कई तरह की फसलें लगती हैं, कई तरह का खान-पान उनसे बनता है। पिछले 35 सालों से इस तरह के प्रयोग कर-कर के श्री जोसेफ ‘खाद’ शब्द का ‘खाद्य’ से संबंध बखूबी समझ गए हैं। वे आज विषेशज्ञ माने जाते हैं खाद के, उस खाद के जिसने कई सदियों से हमारे खेत उपजाऊ रखे हैं, लेकिन जिसे हमारे दूषित शब्दकोश में ‘जैविक खाद’ जैसी अटपटी संज्ञा दी जाती है।
इस जानकारी को श्री जोसेफ ने और बढ़ाना चाहा विश्वविद्यालय में जा कर। कॉलेज में डॉक्टरी की शुरुआती पढ़ाई उन्होंने पहले ही पूरी कर ली थी। विज्ञान की बुनियादी समझ तो उनके पास थी ही, दुनिया भर के वैज्ञानिक शोध को वे कॉलेज की लाइब्रेरी के जरिए पढ़ सकते थे। इस जानकारी का उपयोग उन्होंने अपने प्रयोगों में करना शुरू किया। 1990 के दशक की शुरुआत तक उनका स्लेट छत का कारोबार अच्छा चल चुका था। तब वे ‘द स्लेट रूफ बाइबल’ लिखने की तैयारी में थे।
एक स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में उन्होंने दाखिला ले लिया और अपना शोधग्रंथ लिखने लगे। एक सहपाठी की मदद से वे गहन वैज्ञानिक जानकारी जुटाने लगे, उसकी गहराई और गूढ़ता को समझने लगे। शोधग्रंथ पूरा होने पर उनका मन बदल गया।

अपने शोध को वे विश्विद्यालय को देकर डिग्री कमाने की बजाए एक किताब के रूप में छापना चाहते थे, जिसे साधारण लोग पढ़ सकें। इसके लिए वे गहन वैज्ञानिक विषयों को भी अपने अनुभवों और प्रयोगों की कसौटी कसने लगे, उन्हें नए और व्यवहारिक तरीकों से सीखने लगे। उन्होंने अपना कथानक अपने जीवन और आस-पास की चीजों में ही रखा। वे कहते हैं उनका भरोसा अपने अनुभव पर ज्यादा था, क्योंकि उन्हें कोई भी पी.एच.डी. या डॉक्टरेट किया हुआ वैज्ञानिक ऐसा नहीं मिला, जो अपने टट्टी-पेशाब की खाद खुद बनाता हो। किताबी ज्ञान, उसका ध्येय और उसकी दृष्टि का खोखलापन तो श्री जोसेफ को बहुत पहले ही अखरने लगा था।

फिर वैज्ञानिक शोध ठीक हो भी तो उस पर ध्यान कौन देता है? वे बताते हैं कि 1950 और 1980 के दशक में विश्व स्वास्थय संगठन ने टट्टी-पेशाब से खाद बनाने पर बहुत बढ़िया शोध करवाया था। पर किताबी ज्ञान का कोई मतलब नहीं होता जब तक उसे व्यवहार में न लाया जाए। श्री जोसेफ का ध्येय अलग था। आधुनिक शोध से निकले विज्ञान को वे बारीकी से समझ कर उसे अपनी जीवट शैली में लिखने लगे। शुचिता, स्वास्थ, शरीर, पानी, जीवाणु और रोगाणु, भूजल, प्रदूषण, जमीन की उर्वरता… हर जटिल से जटिल विषय को हल्के-फुल्के, सजीव अंदाज में समझाते गए। लेकिन ऐसी किताब को कोई प्रकाशक छापना नहीं चाहता था। सन् 1995 में श्री जोसेफ ने अपनी किताब की 600 प्रतियां खुद ही छापीं। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि इतनी प्रतियां भी बिक पाएंगीं।

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किताब का शीर्षक था ‘द ह्यूमन्योर हैंडबुक’, जिसके कई संस्करण छप चुके हैं और हजारों प्रतियां बिकी हैं। 15 भाषाओं में इस किताब का अनुवाद हो चुका है। दुनिया भर के पुरस्कार, प्रशंसा और प्रेम सहज ही मिला है। कई सौ पाठकों ने उन्हें धन्यवाद की चिट्ठियां लिखी हैं, कईयों ने कहा है कि इस किताब ने उनका जीवन सुधार दिया है, उन्हें नई दिशा दिखाई है। क्योंकि किताब खुद लेखक के जीवन से निकली है, इसलिए यह बोझिल प्रवचन से मुक्त है। कई विद्वानों ने कहा है कि भगवद्गीता भी हमारे यहाँ इतनी लोकप्रिय इसीलिए है क्योंकि वह कर्मक्षेत्र के बीच से निकली बात है। जीवन के रणक्षेत्रों से निकली बातों का प्रभाव स्थूल पोथियों से ज्यादा होता है।

श्री जोसेफ कहते हैं उनकी किताब का विचार बहुत ही सरल और सीधा है, पर इस विषय पर बातचीत कठिन और बोझिल बना कर की जाती है। जैसे इसकी बात ही नहीं होती कि लोग पीने योग्य पानी में शौच निपटते हैं, जबकी पानी की कमी के बारे में सब जानते हैं। किताब व्यवहारिक तरीके बताती है सूखे शौचालय बनाने के, जिनसे हमारा मल-मूत्र बजाए पानी को दूषित करने के जमीन को उपजाऊ बनाता है।

श्री जोसेफ अपनी बात को कभी भी सरकारी और अकादमिक ताम-झाम में फँसने नहीं देते हैं। उनकी कतई ऐसी रुचि नहीं है कि सरकारें उनके लिखे अनुसार अपनी नीति बदल लें, या उनके विचार पर रातों-रात क्रांति हो जाए। उनका आग्रह हमेशा व्यवहारिक रहता है। कोई भी एक विचार में सारे समाधान नहीं मिल सकते और उनके बनाए सूखे शौचालय हर किसी के काम के नहीं हैं, ऐसा वे खुद कहते हैं। लेकिन साथ ही यह भी कहते हैं कि पीने के पानी से चलने वाले फ्लश के शौचालय दुनिया के हर हिस्से में काम नहीं कर सकते हैं। इसे चलाने जितना पानी और बिजली हमारे पास है ही नहीं।

जोसेफ जेंकिंस की किताबों की जानकारी
www.josephjenkins.com पर मिल सकती है

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Categories: Agriculture, Environment, Sanitation

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