नोवाकः एक जोकर जो छोड़े अवाक्

[ यह लेख भोपाल से छपने वाली पत्रिका ‘अहा!ज़िंदगी‘ के मई 2019 अंक में छपा है]


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नम्बर एक वरीयता के टेनिस खिलाड़ी नोवाक जोकोविच
इस
22 मई को 32 बरस के हो जाएँगे। उनके जन्मदिन पर
उनके अन्दाज़ का बयान कर रहे हैं
सोपान जोशी

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कुछ होते हैं जिन्हें देखते ही हम उन पर मोहित हो जाते हैं। कुछ को देख के विस्मय होता है। कुछ नोवाक जोकोविच जैसे होते हैं जिनका रस धीरेधीरे सिर चढ़ता है।

किसी दूसरे समय में ऐसा खिलाड़ी हुआ होता, तो शायद टेनिस की दुनिया पर राज करता। एक पेशेवर खिलाड़ी के रूप में जब जोकोविच उभर के आए तब ऐसे दो खिलाड़ी अपने चरम पर थे जो खेल की नयी परिभाषा गढ़ रहे थे, जिनकी प्रतियोगिता टेनिस में अभूतपूर्व एहसास पैदा कर रही थी। रॉजर फ़ेडरर की तरह खेल देखने में आनन्द लेने वालों के दिल पर राज करने वाला खिलाड़ी टेनिस में कोई दूसरा नहीं हुआ है। उन्हें खेलते हुए देखना ऐसा आभास देता है कि रेशम का कपड़ा तलवार को ऐन बीच से काट सकता है। जब फ़ेडरर टेनिस के शीर्ष पर राज करने लगे तभी उनसे पाँच साल छोटे राफ़ाएल नडाल उभर के आए। उनका शक्तिशाली शरीर ऐसे फ़ौलाद से ढला लगता है जिसे मोम की तरह मोड़ा जा सकता है।

टेनिस के शिखर पर ऐसी एक प्रतिभा का होना ही अपने आप में करिश्मा था। किन्तु यहाँ तो शीर्ष की सँकरी जगह पर दो विराट खिलाड़ी मौजूद थे। हर प्रतियोगिता, फ़ेडरर और नडाल के बीच का हर मुकाबला खेल के रस की ऐसी झड़ी लगा देता था जिसे सहेजने की जगह किसी टेनिस के रसिक दिल में नहीं होती थी। कह सकते हैंः “टेनिसदास अति आनन्द देख दो मुखारविन्द…” फिर, सन् 2011 में जोकोविच ने बताया कि इस शिखर की होड़ में केवल दो महारथी नहीं हैं। फ़ेडरर की जिस एक बिन्दु को नडाल ने खींच के दो छोर वाली रेखा बना दिया था, उसे जोकोविच ने त्रिकोण बना के रख दिया था।

उस साल मुझे जोकोविच से चिढ़ छूटने लगी थी। उन दिनों फ़ेडरर का खेल मन में बसा हुआ था। पिछले कोई तीन दशकों में हर खेल में ताकत और तकनीक का महत्व बढ़ता ही जा रहा है। इसके विपरीत फ़ेडरर के खेल में अनूठी कोमलता और नफ़ासत झलकती है। उन्हें बहुत से लोग आज तक का महानतम टेनिस खिलाड़ी मानते हैं। ऐसा नहीं है कि उनके शरीर और खेल में ताकत की कमी हो। किन्तु उनके खेल का चरित्र ताकत से नहीं बना है, वह उभरा है ऐसी अनूठी प्रवीणता से जिसमें कोमल फूल खिलते हुए दिखते हैं। लोहारों के युग में फ़ेडरर सुनार लगते हैं, हालाँकि उनके बाजुओं में लोहार की ताकत भी है। सन् 2011 की जनवरी में ऑस्ट्रेलियन ओपन के सेमीफाइनल में फ़ेडरर को हरा के जोकोविच ने खिताब जीता। जून में फ्रेञ्च ओपन के सेमीफाइनल में वे फ़ेडरर से हारे, हालाँकि फाइनल में फ़ेडरर को नडाल ने हरा दिया। अगले महीने विम्बलडन के फाइनल में जोकोविच ने नडाल को हराया। दो महीने बाद जोकोविच ने नडाल को फाइनल में फिर हरा के अमेरिकी ओपन जीता।

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उस आखिरी प्रतियोगिता का सबसे यादगार मैच था जोकोविच और फ़ेडरर का सेमीफाइनल में मुकाबला। दो सेट हारने के बाद जोकोविच ने दो सेट जीत लिए थे। साढ़ेतीन घण्टे के चमकदार खेल के बाद मामला पाँचवें सेट पर आ फँसा था। जोकोविच की सर्विस तोड़ के फ़ेडरर मैच जीतने की कगार पर पहुँच गये थे। दर्शक लगभग सभी उनके समर्थन में तालियाँ बजा रहे थे, उन्हें प्रोत्साहित कर रहे थे। उनके और फाइनल के बीच में केवल एक पॉइन्ट की दूरी थी। सर्विस करने लगे तो सामने जोकोविच अपनी परिस्थिति पर खुद हँस रहे थे, अपना सिर हिला रहे थे, मुँह उकेर रहे थे। फ़ेडरर की दनदनाती हुई सर्विस कोर्ट में गहरी गई और जोकोविच के फोरहैण्ड को छोड़ती हुई जा ही रही थीकि जोकोविच ने बिना किसी चेतावनी के ऐसा शॉट दागा कि गेन्द फ़ेडरर के सामने से होती हुई किनारे निकल गयी। फ़ेडरर अविश्वास में खड़े रह गये, कि काटो तो खून नहीं।

उस एक असम्भव शॉट ने एक प्रवीण खिलाड़ी का आत्मविश्वास तोड़ दिया था। फ़ेडरर हारते गये और मैच भी हार गये। बाद में पत्रकारों से बात करते हुए फ़ेडरर ने कहा कि जोकोविच का वह शॉट तुक्का था और इस तरह की स्थिति में ऐसा शॉट मारना असम्भव होता है। जब जोकोविच की बारी आयी, तो वे बोले कि कठिन मौके पर ऐसे शॉट उनसे लगते ही रहते हैं। फ़ेडरर जैसा कम बोलने वाला एक सूरमा बहानेबाजी पर उतर आया था और सामने एक ऐसा नया सितारा उभर आया था जो कठिनसेकठिन हालात में भी अपनी सम्पट बाँधे रखता था। जिसे तनाव में हँसना आता था, जैसे कि उसके शरीर में खून बहाने वाली नसें किसी अदृश्य फ्रिज से निकल कर आती हों, जिसमें सारी उत्तेजना और गर्मी निकाल के ठण्डे साहस का स्राव होता हो। जोकोविच को मजाक में ‘जोकर’ कहा जाता है। वे कोर्ट पर कई खिलाड़ियों की नकल उतारते रहते हैं। उनकी अदाकारी में गालिब का रवैय्या है, कि दुनिया एक बच्चों के खेल का मैदान है।

फ़ेडरर और नडाल की तुलना में जोकोविच में ऐसा कुछ विशेष नहीं दिखता था कि उनके खेल से लगाव हो। न उनमें जोखिम उठा के खुद अपना खेल बनाने की फ़ेडरर जैसी बाजीगरी थी और न ही नडाल की तरह वे खेल को अपनी ताकत और सामने वाले की कमजोरी पर टिका के रख सकते थे। उनके खेल का हर आयाम कुशल था लेकिन किसी एक में भी आकर्षण नहीं दिखता था। बस, ऐसी असाधारण मानसिकता जो अन्त तक उन्हें हारने नहीं देती थी। एक बात थी जो फिर भी शोभा देती थी। मैच के बाद जब खिलाड़ी रटीरटायी बातें कहते हैं तब जोकोविच में विनम्रता दिखती, सौम्यता दिखती। अगर यह बड़प्पन उनमें नहीं होता, तो शायद उनके खेल को नये सिरे से समझने की कोई इच्छा भी नहीं होती। किन्तु इस खिलाड़ी में जीवटता थी, हास्य था।

जोकोविच की सहजता उनकी असाधारण प्रतिभा को ढँक लेती है। सन् 1989 में 17 साल की उम्र में फ्रैञ्च ओपन जीतने वाले माइकल चैंग के बाद शायद ही कोई खिलाड़ी आया हो जिसमें हर बार गेन्द के पीछे जाने की ऐसी एकाग्रता हो, पाला न छोड़ने की ऐसी प्रतिज्ञा हो। जब सामने वाला उन्हें पाले के एक कोने से दूसरे कोने में धकाता है, तब उसे पता होता है कि किसी भी कोने में जोकोविच हों, वापस रैली में आने में उन्हें देर नहीं लगती। चाहे घास या मिट्टी का नर्म मैदान हो या कठोर कृत्रिम सतह, अपने पैरों को घिसते हुए वे गिरते नहीं हैं। इस तरह से पैर घिसते हुए गेन्द तक पहुँचने वाला कोई और खिलाड़ी याद नहीं आता। ऐसा भी नहीं है कि वे जब दौड़ते हुए दूर जाती गेन्द तक आते हैं, तो घिसटते हुए, लड़खड़ाते हुए दिखें। पैर घिसते समय वे ऐसे दिखते हैं जैसे उन्होंने जूते की नीचे पहियों वाले स्केट लगा रखे हों। उनके असन्तुलन में भी एक तरह का सन्तुलन होता है, जैसा किसी और खिलाड़ी में आज तक नहीं दिखा है।

दूर जाती गेन्द तक पहुँच जाना भर पर्याप्त नहीं होता। शॉट वापस भी खेलना होता है। सन्तुलन की सीमा पर डगमगाते हुए भी जोकोविच का नियन्त्रण नहीं जाता है। पेशेवर टेनिस में खिलाड़ी जिस गति और शक्ति से शॉट लगाते हैं, उतनी ताकत बाजू से होते हुए रैकेट में तभी जा सकती है जब पूरा शरीर किसी नृत्याँगना की तरह तालमेल से चले। इसकी शर्त यह है कि आप अपना सन्तुलन न खोयें, अपनी काया को ऐसी मुद्रा में रखें कि आपके वजन का हर एक ग्राम शॉट में वजन डाले। ऐसा न हो पाये तो या तो आप ढेर हो जाएँगे या गेन्द गलत दिशा में जाएगी। लेकिन अगर आपका नाम जोकोविच है, तो असन्तुलित मुद्रा में भी आप गेन्द पर नियन्त्रण रख सकते हैं, गुरुत्वाकर्षण के जिस बन्धन में सभी कैद रहते हैं उससे अपने शरीर को एक पल के लिए आजाद कर सकते हैं। जिसका मतलब यह है कि जब प्रतिद्वन्दी आक्रामक स्थिति में हो तब भी वह जोकोविच को दचेड़ नहीं सकता। कमजोर हालत में अद्भुत शॉट निकालते हुए वे ऑन्द्रे अगासी की याद दिलाते हैं, जिनके सधे बाजू और कठिन गेन्द पर दनदनाती रिटर्न मारने के गुण की किसी से तुलना है, तो बस जोकोविच से (अगासी उनसे इतने प्रभावित रहे हैं कि कुछ समय उनके शौकिया प्रशिक्षक भी थे)। एक क्षण में नोवाक रक्षात्मक असुरक्षा की अवस्था से जीतने वाला शॉट निकाल सकते हैं। ऐसा खेलने के लिए शरीर में किसी नर्तकसा लोच और मानस में योद्धासी मजबूती चाहिये होती है। जोकोविच में दोनों हैं। माइकल चैंग के टाँगे, ऑन्द्रे अगासी की बाजू भी!

बड़े खिलाड़ियों में गहनता होती है, एक क्षण में अकाल और महाकाल को सञ्जोने की प्रगाढ़ता भी होती है। जोकोविच में इसके अलावा एक तरह मसखरापन भी है, जो उन्हें किसी भी एक क्षण की व्यग्रता में फँसने से रोकता है। उनकी गहनता में एक स्थितप्रज्ञ भाव रहता है। वे युद्ध की बारीकियों में अधबीच फँसे अर्जुन भी होते हैं और मन्द मुस्कान भरते हुए किनारे पर खड़े कृष्ण भी। चाहे उनके फोरहैण्ड शॉट में फ़ेडरर की प्रबल कलाइयों और रैकेट की नर्म पकड़ से निकलने वाला अनूठा संगम न हो। चाहे गेन्द को लौटाते समय वे उस पर उतने घुमाव न डाल पाते हों जितने नडाल डालते हैं – और जितने कि आज तक कोई दूसरा खिलाड़ी नहीं डाल पाया है। लेकिन जोकोविच के खेल में हमेशा ही खेल का भाव रहता है। वे अपने रन्गमञ्च के नायक भी होते हैं, खलनायक भी और सूत्रधार भी वे खुद ही होते हैं।

खेलकूद हमारे लिये जीवन के नाट्यमञ्च में इसलिए इतना गहरा स्थान नहीं रखता क्योंकि दो लोग एकदूसरे से भिड़ते हैं। ऐसा होता, तो सड़कछाप मारपीट या खबरिया टी.वी. चैनलों पर रोज रात होने वाली सिरफुटव्वल को भी खेल का दर्जा ही मिल जाता। नहीं, जब हम बड़े खिलाड़ियों को खेलते हुए देखते हैं, तब नाटकीय तनाव का स्रोत कुछ और होता है। हम सभी यह को यह आभास होता है कि उस महारथी की सबसे बड़ी प्रतियोगिता अपनेआप से है। सबसे बड़ा द्वन्द उसके भीतर चलता है। अपनी असुरक्षा का सामना करना होता है, हार के अपने डर का भी। अपनी काबिलियत के गुमान में लड़खड़ाने से बचना होता है। 

जोकोविच लड़खड़ाते नहीं हैं। असन्तुलित अवस्था में उनका सन्तुलन बना रहता है। क्योंकि वे अपनेआप से कभी जीतते नहीं हैं, इसलिए वे अपनेआप से कभी हारते भी नहीं है

Novak

 

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1 reply

  1. कमाल है, बस कमाल !

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