महात्मा गांधी और हमारी अप्रसांगिकता

[ यह लेख मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद की साहित्य अकादमी की भोपाल से छपने वाली पत्रिका ‘साक्षात्कार’ के अक्टूबरनवम्बरदिसम्बर 2019 के महात्मा गांधी विशेषांक छपा है। ]

'बापू की पाती' पुस्तक से

चित्रः सोमेश कुमार

 

सोपान जोशी

कोलकाता में एक चमत्कार बस हुआ ही था। दंगा करने वाले अपने हथियार जमा करवा रहे थे, प्रायश्चित की बात चल रही थी। हिंदूमुस्लिम दगों की जिस आग को सरकार और पुलिस की सम्पूर्ण शक्ति नहीं बुझा सकी थी उसे मोहनदास गांधी के सत्याग्रह ने थाम दिया था। किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि 77 साल के एक बूढ़े ने मारकाट से झुलसते एक महानगर में शांति स्थापित कर दी थी।

कैसे? बस, भोजन छोड़ के। इस प्रण से कि हिंसा नहीं रुकी तो अपना प्राण त्याग देगें। इसकी न तो कोई मिसाल थी न ही इस नतीजे का खयाल तक कोई कर सका था। रेशम के एक धागे ने तलवार को काट दिया था। चलते हुए संभलने के लिए गांधीजी एक हाथ में लाठी का सहारा रखते थी। मारकाट में लड़खड़ाते हुए कोलकाता को उन्होंने सत्य और अहिंसा की दो लाठियाँ का सहारा थमा दिया था।

गांधीजी को कोलकाता आये को लगभग एक महीना बीत चुका था। इसी बीच देश आजाद हो गया था लेकिन गांधीजी स्वतंत्रता का उत्सव नहीं मना रहे थे। उन्हें दंगे रोकने थे। दिन था 5 सिंतबर, सन् 1947। एक बूढ़े आदमी वाला यह अग्निशमन दल दो दिन बाद ही दिल्ली के लिए रवाना होने वाला था। रेणुका राय नामक एक प्रसिद्ध शिक्षिका और कांग्रेस नेता ने गांधीजी से छात्रों के लिए कुछ सन्देश माँगा। उन्होंने चारपाँच शब्दों का एक वाक्य बंगाली अनुवाद करवा के उन्हें थमवा दियाः “मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है।”

गांधीजी का जीवन ऐसे किस्सों से अटा हुआ है। उनका प्रभाव जितना व्यापक और जादुई था उतनी ही सरलता और सीधापन उनकी भाषा और विचार में थी। उन्होंने सालोंसाल इसकी साधना की थी इसलिए यह युक्ति काम करती थी। देखने वाले को सामने सिर्फ सहजसाधारण प्यार दिखता था, उसके पीछे दशकों की तपस्या से साधी हुई वीरता और सामाजिकता दिखती नहीं थी। गांधीजी की यह युक्ति इतनी अजब थी कि हर तरह से आज भी असम्भव लगती है। ज्यादतर लोगों के लिए इसकी कल्पना कर पाना भी कठिन है। गांधीजी का जीवन हमारी कल्पनाशीलता के लिए चुनौती है। इसके दो कारण हैं।

पहला कारण है गांधीजी की मौलिकता। गांधी जीवन एक विराट प्रयोग था। इसमें पुराने देसी सामाजिक मूल्य खूब सारे थे लेकिन इसमें अफराता हुआ, इतराता हुआ राष्ट्रीय गौरव नहीं था। गांधीजी को एक बार यह समझ में आ जाता थी कि किसी बात में अन्याय है, तो वे उसे दूर करने में उसी समय जुट जाते थे। अगर उन्हें कुछ भी गलत दिखता, तो उसका विरोध करने में और उसे हटाने का प्रयास करने में उन्हें देर नहीं लगती थी। फिर चाहे वह बात देशी हो या विदेशी। इसी तरह उन्हें जो बात न्यायसंगत और सत्यपरक लगती थी उसे अपनाने में भी देर नही लगती थी, चाहे वह स्वदेशी हो या नहीं हो।

गांधीजी ने अपने राजनीतिक सिद्धांत और विचारधारा नहीं गढ़ी। उनके मूल्य थे, उनका विश्वास था, उनका विचार था, राजनीतिक काम भी था। किन्तु कोई एक राजनीतिक आदर्श नहीं था। उनके लिए राजनीति भी समाज में काम करने का एक माध्यम भर थी। इसीलिए चाहे दूसरे लोग अपनेआप को ‘गांधीवादी’ बताएँ, गांधीजी खुद गांधीवादी थे कि नहीं यह पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता, क्योंकि उनकी राजनीति में समय के साथ लगातार बदलाव आते रहे। कोई व्यक्ति जब उनसे कोई गुरुमन्त्र या राजनीतिक विचारधारा माँगता, तो वे अमूमन कुछ व्यावहारिक बात कहते, कुछ अभ्यास और प्रयोग करने की बात करते। जब उनसे कोई राजनीतिक परिकल्पना या सिद्धान्त माँगता, तो वे कुछ ऐसी बात कह देते थे कि उनका जीवन ही उनका सन्देश है।

वे खुद कहते थे कि उनका लिखा किसी परिवेश के भीतर से उपजता है, जिसका भावार्थ देशकाल के हिसाब बदलता है। इसलिए अगर उनके लिखे में कोई विरोधाभास दिखे, तो जो बाद में लिखा है उसे ही माना जाए। और अगर उनके लिखे और किये में कोई विरोधाभास दिखे, तो उनके लिखे की बजाए उनका किया हुआ ही प्रधान माना जाए।

इस तरह की सावधानी अनूठी है। इसके पीछे यह समझ है कि दुनिया बहुत जटिल बातों से बनी है और हमारा सामना कई अन्तर्विरोधों से होता रहता है। यह चेतना भी इसमें दिखती है कि सारी सृष्टि हमने नहीं बनायी है, हम उसके हिस्से भर हैं। इसीलिए गांधीजी के लिए सत्य की साधना ही एकमात्र सहारा था। गांधीजी का सत्य जटिलता को नकारने वाला सैद्धांतिक पोंगापन नहीं था, न ही किसी किताब की तोतारटंत। बल्कि उसमें तरहतरह के नये-पुराने प्रमाण और सामग्री को धारण करने की गहराई थी। उसमें पुरानी बढ़िया बातों को पकड़ के रखने की प्रतिबद्धता भी थी और नयी बातों को आत्मसात करने का लोच भी। इस असम्भवसी बात को साधने में उन्होंने अपना जीवन लगाया।

हमारी कल्पना को दूसरी चुनौती गांधी जीवन की व्यापकता से है। अपने काम को निष्ठा से करने के लिए जो भी जतन, जितना भी शोध करना पड़े, गांधीजी करते थे। स्वास्थ्य, खेती, कारीगरी, भोजन, राजनीति…कोई विषय नहीं मिलेगा जिसे उन्होंने किसीन-किसी कारण से समझने की चेष्टा न की हो। अनगिनत लोगों के साथ उनका पत्राचार था और न जाने कितने लोगों से वे रोजाना मिलते थे।

वे जहाँ जाते थे वहाँ के पोस्ट ऑफिस का काम बढ़ जाता था और ऐसा भी उदाहरण है कि केवल उनकी वजह से अंग्रेज सरकार को पोस्ट ऑफिस खोलना पड़ा। वे हर चिट्ठी का जवाब देते थे। दुनिया भर की सामग्री उनके पास आती थी और उनके यहाँ से दूसरों को जाती थी। दूसरों को लिख-लिख के न जाने कितनी तरह की सामग्री वे लगातार मँगवाते रहते थे और इतनी ही सामग्री उनसे भी लोग मँगवाते थे। ऐसे ही प्रयासों के फलस्वरूप सन् 1917 में उन्हें एक चरखे का प्रारूप मिला था।

इसी वजह से उनका लिखा जो संकलित हो सका वह ही एक सौ खण्ड के उनके वाङ्गमय में है। हर साल जितना उन पर लिखा जाता है, जितना नया शोध उन पर और उनके काम पर होता है, इतना दुनिया के किसी आधुनिक जीवन पर नहीं होता। हर साल नयी किताबें आती हैं जो विविध दृष्टि और परिवेश में गांधी जीवन और कर्मयात्रा के मायने टटोलती हैं। अनेक नये शोध पत्र हर साल छपते हैं। अनगिनत सभासम्मेलन और सेमिनार होते ही रहते हैं जिनमें शास्त्रीय विद्वान भी होते हैं और सामाजिक कार्यकर्त्ता भी। किंतु गांधीजी का शोध अकादमिक नहीं था। वे कोई डिग्री या शास्त्रीय पदवी पाने के लिए या साहित्य की दुनिया में अपना झण्डा गाढ़ने के लिए नहीं लिखते थे।

उनकी भाषा की सरल शैली पर बहुत से लोगों ने लिखा है। उनके काम में शास्त्रीय ठसक नहीं, सहजता और साधरणता दिखती है। उनका शोध और लेखन अपने लोगों को, अपने समाज को समझने के ध्येय से की जाने वाली साधना का मात्र था। अपने आप में यह उनका साध्य नहीं था। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि जिस किसी ने गांधी जीवन का शास्त्रीय अध्ययन किया हो वही गांधी विचार का सामाजिक काम करे। उसके लिए गांधीजी महज एक विषय भी हो सकते हैं जिस पर लेखन उसकी आजीविका का भाग है। ठीक उसी तरह ऐसे लोग भी मिलते हैं जो न गांधीजी का नाम लेते हैं और न गांधीवादी कहे जाते हैं, लेकिन उनके काम और आचरण में गांधी विचार और सामाजिकता की सुगन्ध का आभास होता है।

जो इतना मौलिक हो और इतना व्यापक भी हो, वह हमारी कल्पना में आसानी से समाता नहीं है। पिछली सदी के सबसे यशस्वी वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन ने शायद यह भाँप लिया था। तभी तो सन् 1944 में गांधीजी के जन्मदिन पर लिखे अपने सन्देश में उन्होंने कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद मुश्किल से ही विश्वास करेंगी कि हाड़मांस से बना हुआ कोई ऐसा कोई व्यक्ति भी धरती पर चलताफिरता था।

आज वह पीढ़ियाँ जनम ले चुकी हैं। गांधीजी को समझने की हमारी सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि हमारी कल्पना की माँसपेशियों सिकुड़ चुकी हैं, कठोर हो गयी हैं। उनसे हमें गांधी जीवन और विचार का बोध कैसे होगा? कबाड़ और लोहेलंगड़ का व्यापार करने वाले के पास स्वर्ण और जवाहर आ जाएँ, तो उन्हें बरतने का तरीका उसके पास कैसे आएगा? उसके हथौड़े और तराजू किसी बहुमूल्य और कोमल वस्तु को बरतने में काम आ ही नहीं सकते।

गांधीजी जीवन और कर्मयात्रा हमारी कल्पनाशीलता को है। हर कोई इस चुनौती का सामना न कर सकता है और न करना चाहता ही है। ऐसे में आसान यह रहता है कि गांधी को अपनी सीमित कल्पना और सीमित ज्ञान की शीशी में उतार लें। गांधी को समझने के लिए अगर हम अपने मानस को खींच के बड़ा नहीं कर सकते, तो हम गांधी को अपने सीमित दायरे में तो बाँध ही सकते हैं। उसकी चूक बताने के लिए गांधीजी या उनके निकट के सहयोगी आज हमारे बीच हैं ही नहीं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है हमारे अनेक कार्यक्रमों का एक आई.एस.आईमार्क विषयः “गांधी की प्रासंगिकता।” अंग्रेजी में “रेलेवेन्स ऑफ गांधी” के अनुवाद से आये इन तीन शब्दों से कार्यक्रम-वीरों को बड़ी सुविधा होती है। हमारे यहाँ कई लोगों के लिए कार्यक्रम का आयोजन ही एकमात्र काम है। उन्हें कार्यक्रम अनेक करने होते हैं और तैयार वक्ता और विषय की उन्हें हमेशा दरकार भी रहती है। विषयों की मण्डी में “गांधी की प्रासंगिकता” सदाबहार जिन्स है। ऐसा लगता है कि हर भारतीय गांधीजी को इतना बढ़िया से जानता है कि वह उनके जीवन का, उनके काम का, उनके प्रभाव का मूल्यांकन कर सकता है। किसी तरह के अध्ययन की जरूरत नहीं, अपने आप से कोई कठिन प्रश्न पूछने की आवश्यकता नहीं। ‘अरे, गांधीजी ही तो हैं!’

गांधीजी का नाम और चित्र हमारे चारों तरफ फैले हुए हैं। उनकी एक समाधी है जिस पर फूल चढ़ाना एक कूटनितिक रस्म बन चुकी है। गांधी जयन्ती और पुण्यतिथि कैलेंडर में टँकी हुई तारीखें हैं, जिन्हें कुछ लोग सिर्फ इसीलिए याद रखते हैं क्योंकि उस दिन शराब की दुकानें बन्द रहती हैं। गांधीजी के नाम पर चलने वाले कई गलतसलत सुभाषितों से छात्रों के निबन्ध ही नहीं, राजनेताओं के भाषण भी आबाद होते रहते हैं। तरहतरह के विज्ञापनों में गांधीजी की छवि माल बेचने के लिए इस्तेमाल होती है।

और तो और, स्वच्छता के नाम पर चलने वाले सरकारी कार्यक्रम की छवि साफ करने का काम भी गांधीजी के चश्मे से ही होता है। चाहे इस कार्यक्रम में अपने ही लोगों के खिलाफ हिंसा का उपयोग हो रहा हो और चाहे हमारे नदीतालाब हमारे ही मलमूत्र की वजह से, हमारी तथाकथित स्वच्छता की वजह से ही सड़ रहे हों।

गांधीजी के चश्मे का हम हर तरह का उपयोग करते हैं, बस उन्हें अपनी आँख के आगे लगा के उनमें से देखते भर नहीं हैं। इस चश्में में सत्य और अहिंसा का काँच लगा है जो हमें वह सब दिखला सकता है जिसे देखने से हम डरते हैं, क्योंकि उस सत्य से हमें असुविधा होती है। वह दिखा सकता है कि हमारा अर्थतन्त्र दूसरों को गरीब बना के, पर्यावरण को दूषित कर के ही चलता है। वह दिखा सकता है कि हमारा स्वास्थ्य और शिक्षा तंत्र मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार से बीमार है।

वह दिखा सकता है कि जिस आर्थिक वृद्धि को हमने विकास मान लिया है, वह हमारे भविष्य को औनेपौने दाम पर नीलाम कर के ही प्राप्त होती है। यह भी कि हमारी राजनीति समाज में कुछ अच्छा करने का साधन नहीं बची है, केवल सत्ता और महत्वाकांक्षा की साधना बन के रह गयी है। हमारे किसानकारीगर हताश हैं, उनका रोजगार जा रहा है। हमारी आबादी के एक छोटेसे कुलीन हिस्से के विकास के लिए बाकी सब की बलि चढ़ रही है। हम विकास के नाम पर, धर्म के नाम पर, गोरक्षा के नाम पर, जाति के नाम पर, लिंग के नाम पर, भाषा के नाम पर, राष्ट्र के नाम पर…हिंसा ही कर रहे हैं।

इन सभी बातों के बारे में गांधीजी ने हमें सन् 1909 में ही आगाह कर दिया था, जब 40 साल की उम्र में उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ लिखी थी। दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह की ऊहापोह से उन्हें यह समझ आ गया था कि निरी राजनीतिक आजादी से हम स्वतंत्र नहीं होंगे। उन्हें तभी आभास था कि अगर गरीब देशों ने भी यूरोप की तर्ज़ पर औद्यौगिक विकास अपना लिया, तो पृथ्वी के संसाधन नष्ट होंगे। गांधीजी के समय ‘पर्यावरण’ शब्द का चलन नहीं था लेकिन आज पर्यावरण संरक्षण पर काम करने वाले गांधीजी में लगातार प्रेरणा पाते हैं।

हमारा राजनीतिक तन्त्र, हमारे शोध संस्थान, हमारी व्यवस्थाएँ और नीतियाँ बनाने वाले शास्त्रीय विशेषज्ञों का सामाजिक दृष्टि से मूल्यांकन हो, तो साफ दिखता है कि ये सब अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। हमारी गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाएँ भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति में हैं, बल्कि गांधीजी के नाम पर बनी संस्थाएँ भी संपत्ति और नियंत्रण के लिए आपस में लड़ रही हैं। किन्तु अपनी अप्रासंगिकता की बात साफसाफ करने के लिए साहस चाहिए, यह डरपोक लोगों के बस का नहीं है।

उसे समझने के लिए धीरज और परिश्रम चाहिए, क्षमता और साधना भी। इन सब का योजन तभी हो सकता है जब हममें अपने समाज के लिए, अपने लोगों के लिए कुछ अपनापन हो, जो गांधीजी में था। अगर नहीं हो, तो हम गांधीजी की प्रासंगिकता पर चर्चा कर के काम चला सकते हैं। इससे हमारे कार्यक्रम तो निपट ही सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति की प्रासंगिकता उसके जीतेजी ही होती है, जब उसके पास यह अवसर हो कि वह किसी परिस्थिति में कुछ कर सके। उसकी मृत्यु के बाद उसकी स्मृति शेष रह जाती है, उसकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है। उसके विचार की प्रासंगिकता इससे तय होती है कि उसका नाम लेने वाले उसे आचरण में लेते हैं या नहीं। जब जीवित लोग किसी दिवंगत की प्रासंगिकता पर इतना विमर्श करते हैं, तब कहा जा सकता है कि वे अपने-आप से ऊबे हुए हैं, कि यह विमर्श उनके लिए अपने आलस और अकर्मण्यता को ढँकने का प्रसंग है।

गांधी 150’ गांधीजी के मूल्यांकन का प्रसंग नहीं है। यह हमारे अपने मूल्यांकन का अवसर है। हम कितने प्रासंगिक हैं? क्या है हमारी प्रासंगिकता?

 



Categories: Mahatma Gandhi

Tags: , , ,

2 replies

  1. On October 2,2019:

    आज गाँधी जी की १५० वीं वर्षगाँठ है। उनकी याद में बहुत कुछ कहा जा रहा है, आयोजन किये जा रहे हैं, लेकिन वे अनपेक्षित नहीं कहे जा सकते। उनकी कर्मशीलता , नेतृत्व के सामने इसे आंकना समीचीन न होगा। अस्तु !

    गांधी दक्षिण अफ्रीका से वापस आए और निकल पड़े भारत दर्शन की यात्रा पर। न केवल भारत की थाह लेनी थी उन्हें, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव के द्वारा भारत को समझना और अंतर्मन में पिरो लेने का यह एक ईमानदार प्रयास था, जिसने जीवन को कुछ ऐसा मंथा कि आगे की राह बन सकी। इस पथ को मुख्यतः तीन कारकों ने बनाया और आगे भी प्रशस्त करते गए : १). सनातन धर्मी, वैष्णव संस्कारों के कारण राम पर अगाध श्रद्धा और विश्वास, २). सत्य का संधान, और, ३). भारत के जनमानस की रचनात्मकता और रचनाधर्मिता। ये तीन हमेशा गांधी के साथ रहे, हर विचार में, हर कर्म में। जिसे लोगों ने जिद कहा उसमें भी। शायद, इन तीनों के प्रति ईमानदारी ने ही उन्हें राम राज्य की परिकल्पना दी। हमारा भविष्य का भारत कैसा, क्या होगा यह परिभाषा उन्होंने ही राजनीतिक-सामाजिक फलक में आधुनिक भारत में संभवतः सबसे पहले दी। एक उदार, सजग, ईमानदार, सम्वेदनशील नेतृत्व इस से बेहतर और क्या दे सकेगा ?

    और, आज गांधी एक ऐसे आश्रय है जहां हर तर्क, दोष और अंत में शांति को हम ला पटकते हैं, दशकों से। कोसने को कोई न मिले, तो गांधी तो हैं ही। पर, थाह भी उनकी शरण में ही पाता है हिन्दुस्तानी आदमी। मजे की बात है कि इस शख्स के जन्म के १५० वर्ष पूरे होने पर भी चर्चा चल रही है, भारत और विदेश में भी अगणित लोगों, आन्दोलनों के प्रेरणा-स्रोत हैं वे। वह भी उनके चले जाने के ७१ साल बाद ! उनकी प्रासंगिकता को चुनौती देने से पूर्व अपने ही समय में, अपनों के बीच ज़रा हम अपनी प्रासंगिकता टटोल कर देख लें। किमधिकं !

    विनत श्रद्धान्जलि ! नमन !!

  2. सोपान जी मैं आपके लेखों को पीछले कुछ समय से लगातार पढ़ता आ रहा हूँ। आपके द्वारा लिखित लेखों में जो सच्चाई और श्रद्धा है मैं उसको प्रणाम करता हूँ। पर्यावरण पर आपके विचार मुझे बहुत अच्छे लगते है। मैं आपकी किताब जल थल मल को भी पढ़ रहा हूँ। चूंकि मैं एक छोटे किसान का बच्चा हूं और खुद भी किसान हूं मैं बहुत जुड़ाव महसूस करता हूँ आपके लेखों से। गाँधी जी के विचार और ऐक्टिविसम आपके लेखों से महसूस कर पाता हूँ। कुछ सवाल भी मेरे जेहन में है जो आपसे करना चाहता हूँ अगर आपसे जुड़ने का कोई माध्यम हो जैसे ईमेल आईडी और फोन नंबर तो कृपया कर मुझे दें मैं सदैव aabha

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: