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अनुपम मिश्र। लेखक, संपादक, छायाकार। महाराष्ट्र के वर्धा में सरला और भवानी प्रसाद मिश्र के यहाँ सन् १९४८ में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से १९६८ में संस्कृत पढ़ने के बाद गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, के प्रकाशन विभाग में सामाजिक काम और पर्यावरण पर लिखना शुरू किया। तब से आज तक वही काम, वहीं पर। गाँधी मार्ग पत्रिका का संपादन। कुछ लेख, कुछेक किताबें। "आज भी खरे हैं तालाब" को खूब प्यार मिला। कोई दो लाख प्रतियां छपी।

  • शिक्षा: कितना सर्जन, कितना विसर्जन

    ….   सेंट्रल इंस्टीट्यूट आॅफ एजूकेशन के 67वें स्थापना दिवस के अवसर पर दिनांक 19दिसंबर 2014 को दिया गया अनुपम मिश्र का भाषण।   कोई एक सौ पचासी बरस पहले की बात हैं। सन् 1829 की। कोलकाता के शोभाबाजार नाम… Read More ›

  • पुरखों से संवाद

    … मृतकों से संवाद और पुरखों से संवाद, ये दो अलग बातें हैं। इस अंतर में जीवन के एक रस का भास भी होता है।   अनुपम मिश्र जो कल तक हमारे बीच थे, वे आज नहीं हैं। आज हम… Read More ›

  • भाषणः तकनीक कोई अलग विषय नहीं है

    [ अनुपम मिश्र का ‘क’ कला संपदा एवं वैचारिकी द्वारा नागपुर में आयोजित सम्मेलन में दिया गया भाषण, दिसंबर दो हजार सात ]   मेरा जो परिचय आपने सुना उसमें कोई तकनीकी शिक्षा का आपको आभास नहीं मिलेगा। फिर भी… Read More ›

  • दुनिया का खेला – भाषण

    [16 अगस्त 2013 को साहित्य अकादमी में दिया अनुपम मिश्र का नेमिचंद स्मृति व्याख्यान] मैं उनसे कभी मिल नहीं पाया था। सभा गोष्ठियों में दूर से ही देखता था उन्हें। अपरिचय की एक दीवार थी। यह कोई ऊँची तो नहीं… Read More ›

  • साध्य, साधन और साधना

    अगर साध्य ऊंचा हो और उसके पीछे साधना हो, तो सब साधन जुट सकते हैं अनुपम मिश्र यह शीर्षक न तो अलंकार के लिए है, न अहंकार के लिए। सचमुच ऐसा लगता है कि समाज में काम कर रही छोटी–बड़ी… Read More ›

  • रावण सुनाए रामायण

    सनातन धर्म से भी पुराना एक और धर्म है। वह है नदी धर्म। गंगा को बचाने की कोशिश में लगे लोगों को पहले इस धर्म को मानना पड़ेगा। अनुपम मिश्र बिलकुल अलग–अलग बातें हैं। प्रकृति का कैलेंडर और हमारे घर–दफ्तरों… Read More ›

  • Sadhya, Sadhan, Sadhana

    – Anupam Mishra Three Hindi words that guarantee the translator a headache. With a margin for semantic error, they represent, respectively: the ends, the means, and a penance-like labour to harness the means to achieve an end. I did not… Read More ›