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अनुपम मिश्र। लेखक, संपादक, छायाकार। महाराष्ट्र के वर्धा में सरला और भवानी प्रसाद मिश्र के यहाँ सन् १९४८ में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से १९६८ में संस्कृत पढ़ने के बाद गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, के प्रकाशन विभाग में सामाजिक काम और पर्यावरण पर लिखना शुरू किया। तब से आज तक वही काम, वहीं पर। गाँधी मार्ग पत्रिका का संपादन। कुछ लेख, कुछेक किताबें। "आज भी खरे हैं तालाब" को खूब प्यार मिला। कोई दो लाख प्रतियां छपी।

  • प्रलय का शिलालेख

    उत्तराखंड में हिमालय और उसकी नदियों के तांडव का आकार प्रकार अब धीरे–धीरे दिखने लगा है। लेकिन मौसमी बाढ़ इस इलाके में नई नहीं है। सन् 1977 में अनुपम मिश्र का लिखा एक यात्रा वृतांत   सन् 1977 की जुलाई… Read More ›

  • जड़ें

    जड़ों की तरफ मुड़ने से पहले हमें अपनी जड़ता की तरफ भी देखना होगा, झांकना होगा। यह जड़ता आधुनिक है। इसकी झांकी इतनी मोहक है कि इसका वजन ढोना भी हमें सरल लगने लगता है। बजाय इसे उतार फेंकने के,… Read More ›

  • भाषा और पर्यावरण

    हमारी भाषा नीरस हो रही है क्योंकि हमारा माथा बदल रहा है। पर्यावरण की भाषा भी बची नहीं है। वह हिंदी भी है यह कहते हुए डर लगता है। पिछले ५०–६० बरस में नए शब्दों की एक पूरी बारात आई… Read More ›

  • आग लगने पर कुआं खोदना

    अकाल अकेले नहीं आता। उससे बहुत पहले अच्छे विचारों का अकाल पड़ने लगता है। अच्छे विचार का अर्थ है अच्छी योजनाएं, अच्छे काम। यह लेख जरा पुराना है, लेकिन अकाल भी इतना नया नहीे है। अनुपम मिश्र अकाल की पदचाप… Read More ›