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छपाक्! – ‘जल थल मल’ की कहानी

[ यह लेख रज़ा फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक ‘समास’ के वर्ष ७ अंक १८ में छपा है। ] सोपान जोशी  |  सभी चित्र सोमेश कुमार द्वारा   तीन व्यंजनों को मिला के बना एक शब्द है ‘छपाक्’। एक बार इसे… Read More ›

सूखाः एक दरिद्र समाज की चुनावी त्रासदी

[ यह लेख ‘इंडिया टुडे’ पत्रिका के 26 जून 2019 के अंक के 36वें पन्ने पर छपा है ] – सोपान जोशी बस, एक महीने की बात है। हम बाढ़ से होने वाले नुकसान की बात कर रहे होंगे। तब… Read More ›

साधारण-सा जीवन, दो असाधारण किताबेंः जोसेफ जेंकिन्स

[यह लेख ‘गांधी मार्ग’ पत्रिका के जनवरी-फरवरी 2013 अंक में छपा था।] …………….. सिर के ऊपर पारंपरिक स्लेट पत्थर की छत और पाँव के नीचे अपने ही मल-मूत्र से बनी खाद। जोसेफ जेंकिन्स के दो प्रसिद्ध परिचय हैं। 15 साल… Read More ›

एक निर्मल कथा

…… हमारे दूसरे शहरों की तरह कोलकाता अपना मैला सीधे किसी नदी में नहीं उंडेलता। शहर के पूर्व में कोई 30 हजार एकड़ में फैले कुछ उथले तालाब और खेत इसे ग्रहण करते हैं और इसके मैल से मछली, धान… Read More ›