जल थल मल


 

इस शीर्षक की किताब जुलाई 2016 में नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से छप चुकी है। हर प्रति की कीमत है 300 रुपये। ऑर्डर ऑनलाइन भुगतान के द्वारा इस लिंक से किया जा सकता हैः

jalthalmal.in

या फिर Gandhi Peace Foundation के नाम चेक या ड्राफ्ट बना कर इस पते पर भेजें
(लिफाफे के ऊपर “जल थल मल” लिखना न भूलें।)ः

गांधी शांति प्रतिष्ठान,

221, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग,
नई दिल्ली 110002

फोनः 011-23237491, 93

 

 

व्यंग में कहा जाता है, और आपने शायद पढ़ा भी हो, कि भारत में संडास से ज़्यादा मोबाइल फ़ोन हैं। अगर भारत में हर व्यक्ति के पास मल त्यागने के लिए संडास हो तो कैसा रहे? लाखो लोग शहर और कस्बो में शौच जाने के लिए जगह तलाशते हैं, और मल के साथ गरिमा भी त्यागनी पड़ती है। महिलाएं जो कठिनाई झेलती हैं उसे बतलाना भी कठिन है। शर्मसार वो भी होते हैं जिन्हे दूसरों को खुले में शौच जाते हुए देखना पड़ता है। तो कितना अच्छा हो कि हर किसी को संडास मिले। ऐसा करने के लिए कई लोगों ने भरसक कोशिश की है, जैसे गुजरात में ईश्वरभाई पटेल का बनाया सफ़ाई विद्यालय और बिंदेश्वरी पाठक के सुलभ शौचालय।

लेकिन अगर हर भारतीय के पास शौचालय हो जाए तो इसका एक बहुत बुरा परिणाम भी निश्चित ही होगा। हमारे सारे जल स्रोत—नदियां और उनके मुहाने, छोटेबड़े तालाब, जो पहले से ही बुरी तरह दूषित हैं—पूरी तरह तबाह हो जाएंगे। आज तो हमारे देश में आधे से भी कम लोगों के पास शौचालय की सुविधा है। इनसे ही जितना मैला पानी गटर में जाता है उसे साफ़ करने की व्यवस्था हमारे पास नहीं है। परिणाम आप किसी भी नदी में देख सकते है। जितना बड़ा शहर उतने ही ज्यादा शौचालय और उतनी ही दूषित नदियां। दिल्ली में यमुना हो चाहे बनारस में गंगा। जो नदियां हमारी मान्यता में पवित्र हैं वो वास्तव में गटर बन चुकी हैं। सरकारो ने दिल्ली और बनारस जैसे शहरों में अरबों रुपए खर्च कर मैला पानी साफ़ करने के संयन्त्र बनाए हैं, जो सीवेज ट्रीटमेन्ट प्लांट कहलाते है। पर नदियां दूषित ही बनी हुई हैं। यह सब संयन्त्र दिल्ली जैसे सत्ता के अड्डे में गटर का पानी बिना साफ़ किए यमुना में उढेल देते हैं।

हमारी बड़ी आबादी इसमे बड़ी समस्या है। जितने शौचालय भारत में चाहिए उतने अगर बन गए तो घनघोर जल संकट भी खड़ा हो जाएगा। पर नदियों का प्रदूषण का खास कारण शौचालयों से निकला मैला पानी है। जितने धनवान लोग उतने ही आलीशान शोचालय और उतना ही ज़्यादा मैला पानी। ग़रीब लोग जो खुले में पाखाने जाते हैं उनका मल गटर तक पहुँचता ही नहीं है, उनके पास सीवर की सुविधा नहीं है। फिर भी जब यमुना को साफ़ करने का जिम्मा सर्वोच्च न्यायालय ने उठाया तो झुग्गी में रहने वालो को उजाड़ा। न्यायधीशों ने अपने आप से ये सवाल नहीं किया कि जब सर्वोच्च न्यायालय में फ़्लश चलाते हैं तो यमुना के साथ कितना न्याय करते हैं।

इससे बड़ी एक और विडम्बना है। जब हमारे जल स्रोत सड़ांध देते नाइट्रोजन के दूषण से अटे पड़े हैं तब हमारी खेती की जमीन से जीवन देने वाला नाइट्रोजन रिसता जा रहा है। कोई भी किसान या कृषि विज्ञानी आपको बता देगा कृत्रिम खाद डालडाल कर हमारी खेतिहर जमीन बंजर होती जा रही है। चारे की घोर तंगी है और मवेशी रखना आम किसानो के बूते से बाहर हो गया है। नतीजतन गोबर की खाद की भी बहुत तंगी है। कुछ ही राज्य हैं जैसे उत्तराखण्ड जहाँ आज भी जानवर चराने के लिए जंगल बचे हैं। उत्तराखण्ड से खाद पंजाब के अमीर किसानो को बेची जाती है। उर्वरता के इस व्यापार को ठीक से समझा नहीं गया है अभी तक।

तो हम अपनी जमीन की उर्वरता चूस रहे हैं और उससे उगने वाले खाद्य पदार्थ को मल बनने के बाद नदियों में डाल रहे हैं। अगर इस मलमूत्र को वापस जमीन में डाला जाए—जैसा सीवर डलने के पहले होता ही था—तो हमारी खेतिहर जमीन आबाद हो जाएगी और हमारे जल स्रोतों में फिर प्राण लौट आएंगे।

पर हम ऐसा नहीं करते। इसकी कुछ वजह तो है हमारे समाज का इतिहास। दक्षिण और पश्चिम एशिया के लोगों में अपने मलमूत्र के प्रति घृणा बहुत ज़्यादा है। ये घृणा हमारे धार्मिक और सामाजिक संस्कारों में बस गयी है। हिंदू, यहूदी और इस्लामी घारणाओं में मलमूत्र त्याग के बाद शुद्धी के कई नियम बतलाए गए हैं। लेकिन जब ये संस्कार बने तब गटर से नदियों के बर्बाद होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती होगी। वर्ना क्या पता नदियों को साफ़ रखने के अनुष्ठान भी बतलाए जाते और नियम होते नदियों को शुद्ध रखने के लिए।

बाकी सारे एशिया में मलमूत्र को खाद बना कर खेतो में उपयोग करने की परंपरा रही है। फिर चाहे वो चीन हो, जापान, या इण्डोनीशिया। हमारे यहाँ भी ये होता था, पर जरा कम। क्योंकि हमारे यहाँ गोबर की खाद रही है, जो मनुष्य मल बनी खाद से कहीं बेहतर होती है। भारत के भी वो भाग जहाँ गोबर कि बहुतायत नहीं थी वहाँ मलमूत्र से खाद बनाने का रिवाज था। लद्दाख में तो आज भी पुराने तरीके के सूखे शौचालय पाए जा सकते हैं जो वृष्टा को खाद बनाते थे। आज पूरे भारत में चारे और गोबर की कमी है, और लद्दाख जैसे ही हाल बने हुए हैं। तो क्यों पूरा देश ऐसा नहीं करता?Feces

कुछ लोग कोशिश मे लगे हैं कि ऐसा हो जाए। इनमे ज्यादातर गैरसरकारी संगठन हैं और साथ में हैं कुछ शिक्षा विद् और शोधकर्ता। इनका जोर है इकोलॉजिकल सॅनिटेशन या इकोसॅन पर। ये नए तरह के शौचालय हैं जिनमे मल और मूत्र अलगअलग खानो में जाते हैं जहाँ इन्हे सड़ा कर खाद बनाया जाता है।

इस विचार में बहुत दम है। कल्पना कीजिए कि जो अरबो रुपए सरकार गटर और मैला पानी साफ़ करने के संयन्त्रो पर खर्च करती है वो अगर इकोसॅन शौचालयों पर लगा दे तो करोड़ो लोगो को शौचालय मिलेंगे। नदियां स्वत: ही साफ़ हो जाएंगी। किसानो को टनो प्राकृतिक खाद मिलेगी और जमीन का नाइट्रोजन जमीन में ही रहेगा, क्योंकि भारत की आबादी सालाना 80 लाख टन नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ेट और पोटॅशियम दे सकती है। हमारी 115 करोड़ की आबादी जमीन और नदियों पर बोझ होने की बजाए उन्हे पालेगी क्योंकि हर व्यक्ति खाद की फ़ॅक्टरी होगा। जिनके पास शौचालय बनाने के पैसे नहीं हैं वो अपने मलमूत्र की खाद बेच सकते हैं। अगर ये काम चल जाए तो लोगो को शौचालय इस्तेमाल करने के लिए पैसे दिए जा सकते हैं। इस सब में कृत्रिम खाद पर दी जाने वाली 50,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी पर होने वाली बचत हो आप जोड़ें तो इकोसॅन की संभावना का अंदाज़ लगेगा।

लेकिन कई साल के प्रयास के बाद भी इकोसॅन फैला नहीं है। इसका एक कारण है मैला ढोने की परंपरा। जैसा कि चीन में भी होता था, मैला ढोना का काम एक जाति के पल्ले पड़ा और उस जाति के सब लोगों को कई पीढ़ियों तक अमानवीय कष्ट झेलने पड़े। एक पूरे वर्ग को मेहतर या भंगी बना कर हमारे समाज ने अछूत करार दे कर उनकी अवमानना की। आज भी भंगी शब्द के साथ बहुत शर्म जुड़ी हुई है।

इकोसॅन से डर लगता है कई लोगों को जिनमे कुछ सरकार में भी हैं। उन्हे लगता है कि सूखे शौचालय के बहाने कहीं भंगी परंपरा लौट ना आए। डर वाजिब भी है। पर इसका एकमात्र उपाय है कि इकोसॅन शौचालय का नया व्यवसाय बन पाए जिसमे हर तहर के लोग निवेश करें ये मानते हुए कि इससे व्यापारिक लाभ होगा। जो कोई एक इसमे पैसे बनाएगा वो दूसरो के लिए और समाज के लिए रास्ता खोल देगा। अगर ऐसा होता है तो सरकार की झिझक भी चली जाएगी। इकोसॅन ऐसी चीज़ नहीं है जो सरकार के भरोसे चल पड़ेगी। इसे करना तो सामाज को ही पड़ेगा। कयोंकि इसकी कामयाबी समाज में बदलाव के बिना संभव नहीं है।

सोपान जोशी

16 replies

  1. When thought are clear, thought can be focused and can work stronger then weapons.
    I consider clear thoughts are blessings of god. I congratulate Sopan ji for the wonderful and thought provoking article.

  2. इस प्रयोग को छोटे स्तर पर पहले किसी गांव या कस्बे मे करना चाहिये।उसके बाद बा्की लोग वहां का अनुसरण कर सकते हैं।

  3. सोपानजी, इत्तफाकन कल मेरे हाथ में एक पुरानी गांधी मार्ग आयी. उसमे जोसफ जेनकींस के बारे में आपका लेख “ साधारण आदमी : असाधारण पुस्तके” पढ़ा. मैंने उनकी पुस्तक “हुमनुअरे हैंडबुक” प्रकाशित करने की परमिशन मांगी और उन्होंने अगले दिन ही अनुबन्ध भेज दिया. हम अगले एक दो महीने में पुस्तक ( इंग्लिश एडिशन) प्रकाशित कर रहे है।

    में चाहता हूँ की पुस्तक के भारतीय संस्करण के लिए आप प्रस्तावना लिखे।

  4. वास्तव में आपने एक मौलिक विषय उठाया है.

  5. Your academic research could help our great Nation. Provide assistance to evolve methods for Water Department, Environment, Health, inclusiveness of citizen mostly women and Dalit/ Walmiki, and hygiene ettiquette to normal and ordinary citizen down the line. Thank you

  6. sir u have really picked a genuine topic that can solve many problem in india specially to the people who r not able to afford machines and devices for this purpose.

  7. sopan ji i would like to meet u and hope ur academic research an solutions can help our farmers to get rid off from vicious circle of poverty that cause due to costly fertilizers and pesticides.
    moreover it may genuinely provide pesticide free food to the indians.

  8. Thanks for this article.

  9. How nice it looks when one comes out with an innovation especiallywhen somebody talks of a total changge and criticises the existing set up. But think for a while in the name of slogans no body make the existing system defunct. Who willbear the cost if all bathrooms inthe country are changed. Secondly inthe bigger cities the concept of attached bathrooms cannot be made dejunct. Any way idea is good and more so when it is talked of Grib-admi etc.

  10. सोपान जी, आपका लेख काफी प्रेरणास्पद है । मैं एक कस्बेनुमा शहर में रहता हूँ । हमारे यहाँ अधिकांश घरों में शौचालय बने हुए हैं । मगर जब सीवेज टेंक खाली किये जाते हैं तब कोई भी व्यक्ति जिसके पास खेत है वो अपने खेत में टेंक से निकले सारे मटेरियल को डलवा लेता है न की उसे पानी में बहाया जाता है । लेकिन आसपास के गाँवों में शौचालय की समस्या बनी हुई है । वहाँ आपके सुझावो पर काम किया जा सकता है ।

  11. Idea is good. It should be started at micro level .Good outcomes can lead it to macro level.

  12. Bhai Sopanji, Aaj main bhi haajir naajir.

  13. that book is really so good for all of us and also for our society

  14. Give contact No. where i have ordered books

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